आज विश्व विरासत संरक्षण दिवस (International Day for Monuments and Sites) है. ये दिवस स्मारकों, सांस्कृतिक धरोहरों और विश्व विरासत स्थलों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है. 2026 में इस दिवस की थीम ‘Emergency Response for Living Heritage in Contexts of Conflicts and Disasters’ है, जो संघर्षों और आपदाओं के बीच जीवंत धरोहर (Living Heritage) की आपातकालीन सुरक्षा पर केंद्रित है.
इस अवसर पर हम चर्चा करते हैं अनिमेष मुखर्जी की हालिया पुस्तक ‘इतिहास की थाली’ (प्रकाशक: पेंगुइन स्वदेश, 2026) की. ये पुस्तक केवल खाने की रेसिपी या पाककला की किताब नहीं है, बल्कि भोजन के माध्यम से इतिहास को समझने का एक अनोखा और स्वादिष्ट प्रयास है.
लेखक अनिमेष मुखर्जी (जिनकी पिछली पुस्तक ‘ठाकुरबाड़ी’ काफी चर्चित रही) ने इस किताब में दिखाया है कि हमारी थाली में हर निवाला, हर मसाला और हर व्यंजन एक कहानी कहता है. किताब की शुरुआत चाय से होती है, जो भारतीय सुबह का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन इसका वैश्विक सफर कैसे हुआ, ये पढ़कर हैरानी होती है.
पुस्तक बताती है कि कोलंबस भारत नहीं पहुंच सका, फिर भी अमेरिका से आए आलू-टमाटर-मिर्च ने हमारी रसोई को पूरी तरह बदल दिया. पाव भाजी जैसा ‘स्वदेशी’ लगने वाला व्यंजन वास्तव में पुर्तगाली और अमेरिकी प्रभाव का नतीजा है. बिरयानी, रोटी की क्रांति, नमक सत्याग्रह और 1947 के बंटवारे तक, सब कुछ थाली से जुड़कर देखा गया है.
लेखक सरल, व्यंग्यात्मक और रोचक भाषा में लिखते हैं कि खाना सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि सत्ता, व्यापार, उपनिवेशवाद, संस्कृति मिश्रण और सामाजिक परिवर्तनों का आईना है. ‘रोटियों से क्रांति करने और नमक से सत्ता गिराने वाले देश’ में भोजन कैसे राजनीति और इतिहास को आकार देता है, ये किताब बेहद जीवंत तरीके से उजागर करती है. कुल 185 पृष्ठों की ये पुस्तक ग्लोबल से लोकल तक के कनेक्शन को जोड़ती है और पढ़ते हुए लगता है कि आप थाली परोसते हुए ही इतिहास की यात्रा पर निकल पड़े हैं.
विश्व विरासत संरक्षण दिवस पर ये पुस्तक इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि भोजन हमारी अमूर्त (Intangible) सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है. यूनेस्को भी Living Heritage या जीवंत धरोहर को मान्यता देता है, जिसमें पाक परंपराएं, त्योहारों के व्यंजन और क्षेत्रीय खान-पान शामिल हैं.
‘इतिहास की थाली’ हमें याद दिलाती है कि हमारी रसोई की विरासत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी ताजमहल या अजंता की गुफाएं. यदि हम भोजन की कहानियों को भूल जाते हैं, तो हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों का एक बड़ा हिस्सा खो देते हैं. किताब में दिखाया गया है कि कैसे विदेशी प्रभावों ने भारतीय थाली को समृद्ध किया, लेकिन साथ ही स्थानीय स्वाद और परंपराएं कैसे बची रहीं. ये सांस्कृतिक संरक्षण का सुंदर उदाहरण है.
आज के संदर्भ में, जब संघर्ष और आपदाएं सांस्कृतिक धरोहर को खतरे में डाल रही हैं, तब ‘इतिहास की थाली’ जैसे लेखन हमें सिखाते हैं कि विरासत को बचाना केवल इमारतों तक सीमित नहीं है. ये हमारी रोजमर्रा की जिंदगी तक फैली हुई है.
विश्व विरासत संरक्षण दिवस पर ‘इतिहास की थाली’ हमें याद दिलाती है कि विरासत को बचाना है तो पहले उसे समझना होगा. और समझने का सबसे मधुर तरीका है, उसे खाना और उसके किस्से सुनना.
अपनी थाली सजाइए, किताब खोलिए और इतिहास को चखिए. अनिमेष मुखर्जी की ये रचना निश्चित रूप से आपके ज्ञान और स्वाद दोनों को समृद्ध करेगी.
-भारत एक्सप्रेस
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