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8 अप्रैल 1974: जब पटना की सड़कों पर उतरी थी ‘मौन क्रांति’: जेपी की जीवनी में कैद है लोकतंत्र की आजादी की गाथा

8 अप्रैल 1974 का दिन भारतीय राजनीति में अहिंसक संकल्प का प्रतीक है. सुप्रसिद्ध इतिहासकार बिमल प्रसाद और सुजाता प्रसाद की पुस्तक ‘क्रांति का सपना’ (वाणी प्रकाशन) जेपी के उस मौन जुलूस की याद दिलाती है.

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Edited by Vaibhav Gupta

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘क्रांति का सपना’ जयप्रकाश नारायण (जेपी) के जीवन और विचारों पर एक महत्वपूर्ण जीवनी है, जो मात्र व्यक्तिगत जीवन-वृत्त नहीं बल्कि भारतीय लोकतंत्र के संघर्ष और संपूर्ण क्रांति की अवधारणा का गहन दस्तावेज है. लेखक बिमल प्रसाद (सुप्रसिद्ध इतिहासकार और जेपी के निकट सहयोगी) तथा उनकी पुत्री सुजाता प्रसाद हैं. अंग्रेजी मूल से हिंदी अनुवाद आशुतोष भारद्वाज ने किया है.

1974 की जुलूस पर डालती प्रकाश

पुस्तक बिहार आंदोलन के उस निर्णायक मोड़ पर विशेष रूप से प्रकाश डालती है जब 8 अप्रैल 1974 को पटना की सड़कों पर मौन जुलूस निकला. छात्र-युवकों के नेतृत्व में 18 मार्च 1974 को शुरू हुआ बिहार आंदोलन पुलिस दमन और हिंसा के कारण बेतरतीब हो गया था. आंदोलनकारियों ने जेपी से नेतृत्व संभालने का आग्रह किया. जेपी ने अहिंसा की शर्त पर सहमति दी और उसी दिन सड़कों पर उतरे.

इस मौन जुलूस को ‘मौन क्रांति’ कहा जाता है. जुलूस में शामिल लोगों के मुंह पर पट्टियां बंधी थीं, हाथ पीछे बंधे हुए थे. लिखित नारा था- ‘क्षुब्ध हृदय है, बंद जुबान’

कुछ आंदोलनकारों के हाथों में तख्तियां थीं जिन पर लिखा था- ‘हमला चाहे जैसा होगा, हाथ हमारा नहीं उठेगा.’

जेपी के साथ फणीश्वरनाथ रेणु जैसे साहित्यकार और अन्य कई प्रमुख व्यक्ति भी इस जुलूस में शामिल थे. ये दृश्य प्रतीकात्मक था- क्रोधित हृदय, लेकिन हिंसा का रास्ता पूरी तरह अस्वीकार. पुस्तक इस घटना को विस्तार से चित्रित करती है कि कैसे जेपी के नेतृत्व ने आंदोलन में गंभीरता और अनुशासन भर दिया.

क्रांति का सपना

प्रत्यक्षदर्शी वर्णनों के अनुसार, उस दिन फ्रेजर रोड स्थित पी.टी.आई. दफ्तर भवन की पहली मंजिल से पूरा दृश्य देखा जा रहा था. जेपी ने वहां से प्रतिष्ठित पत्रकार एस.के. घोष (मंटू दा) को देखकर हाथ जोड़कर प्रणाम किया था.

‘क्रांति का सपना’ इस मौन जुलूस को जेपी के पूरे जीवन-दर्शन से जोड़कर देखती है. बिमल प्रसाद, जो जेपी के निकट रहे, इस घटना को केवल एक जुलूस नहीं बल्कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए अहिंसक संकल्प का प्रतीक मानते हैं. पुस्तक बताती है कि इसी आंदोलन की परिणति 1975 की इमरजेंसी और 1977 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी सरकार की हार में हुई. जनता ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए जोरदार जवाब दिया.

जेपी के जीवनी को विस्तार से दिखाती पुस्तक

पुस्तक की खासियत यह है कि ये जेपी की जीवनी को 1920 के दशक के उनके रेडिकल विचारों से लेकर सम्पूर्ण क्रांति के आह्वान तक विस्तार से ले जाती है. सुजाता प्रसाद ने अपने पिता की अधूरी रचना को पूरा किया है, जिससे यह कृति और भी आत्मीय हो गई है. अनुवादक आशुतोष भारद्वाज ने मूल की गहराई को हिंदी में बखूबी उतारा है.

मशहूर छायाकार सत्यनारायण दूसरे द्वारा ली गई कालजयी तस्वीरों का भी पुस्तक में संदर्भ मिलता है, जिनकी 2015 में प्रकाशित पुस्तक ‘कैमरे में संपूर्ण क्रांति 1974’ इस मौन जुलूस की दृश्य गाथा प्रस्तुत करती है.

‘क्रांति का सपना’ पढ़ते हुए पाठक महसूस करता है कि जेपी का सपना केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि समाज, शिक्षा, राजनीति और नैतिकता में सम्पूर्ण परिवर्तन का था. ये पुस्तक हमें याद दिलाती है कि असली क्रांति हिंसा से नहीं, बल्कि अटूट संकल्प, अहिंसा और मौन के शक्तिशाली प्रदर्शन से आती है.

बिहार आंदोलन समझने वालो के लिए जरूरी

वाणी प्रकाशन की ये कृति इतिहास प्रेमियों, राजनीति के छात्रों और हर उस नागरिक के लिए अनिवार्य है जो समझना चाहता है कि 1974 का बिहार आंदोलन भारतीय लोकतंत्र की दूसरी आजादी की लड़ाई कैसे बना. 8 अप्रैल 1974 का वो दिन, जब पटना की सड़कें मौन थीं लेकिन हृदय क्षुब्ध थे, आज भी प्रासंगिक है.

‘क्रांति का सपना’ जेपी को सिर्फ याद नहीं करता, बल्कि उनके अधूरे सपने को फिर से जीवंत करता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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