Supreme Court on Teachers: सुप्रीम कोर्ट में एक छात्र की आत्महत्या से जुड़े मामले में प्रोफेसर की याचिका पर सुनवाई के दौरान बेहद तीखी बहस देखने को मिली. अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि आधुनिक समय में अनुशासन के नाम पर छात्रों का मानसिक उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट में हुई इस बहस से यह साफ हो गया है कि आज के दौर में बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य और उनका आत्मसम्मान सर्वोपरि है. जहां एक तरफ बचाव पक्ष ने इसे लोन रिकवरी एजेंटों का उत्पीड़न और शिक्षक का सामान्य अनुशासन बताया, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि क्लास में सबके सामने बच्चों को जलील करने के पुराने ढर्रे को अब स्वीकार नहीं किया जाएगा. अदालत के मुताबिक, शिक्षकों को यह समझना होगा कि वक्त बदल चुका है.
एक छात्र की आत्महत्या के मामले में आरोपी प्रोफेसर की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में बेहद नाटकीय और गंभीर बहस देखने को मिली. अदालत इस बात पर विचार कर रही थी कि क्या शिक्षक द्वारा दी गई डांट या अपमान को आत्महत्या के लिए उकसाना माना जा सकता है.
प्रोफेसर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस नायडू ने अदालत में तर्क दिया कि कक्षा में कथित तौर पर किया गया अपमान आत्महत्या से पूरे एक महीने पहले हुआ था. इसलिए, कानूनी तौर पर इसे छात्र की मौत का तात्कालिक या सीधा कारण (Proximate Cause) नहीं माना जा सकता. वरिष्ठ वकील ने अदालत का ध्यान छात्र की मौत से ठीक एक घंटे पहले हुई एक अन्य घटना की ओर खींचा. उन्होंने दावा किया कि छात्र ने एक ऐप से लोन लिया था और बिना अनुमति के अपने प्रोफेसर को गारंटर बना दिया था, जिसके बाद लोन रिकवरी एजेंट उसे लगातार प्रताड़ित कर रहे थे.
शिक्षकों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का विरोध करते हुए वकील ने दलील दी कि एक शिक्षक अक्सर छात्र के भले के लिए सख्त रवैया अपनाता है. उन्होंने कहा कि अगर इस तरह के मामलों पर मुकदमे दर्ज होने लगे, तो शिक्षकों में अनुशासन बनाए रखने का डर खत्म हो जाएगा और इसका समाज पर बुरा असर पड़ेगा.
इस दलील पर जस्टिस संदीप मेहता ने बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए टिप्पणी की कि अब समय बदल गया है. उन्होंने कहा, ‘शायद हमारे दिनों में शिक्षकों द्वारा पिटाई करना या डांटना आम बात थी… लेकिन अब चीजें पूरी तरह बदल गई हैं. ‘जस्टिस मेहता ने आगे कहा कि यदि किसी छात्र को उसकी कक्षा में, उसके सहपाठियों के सामने अपमानित किया जाता है, तो उसके मानस (Psyche) पर पड़ने वाले गहरे प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समाज में यह संदेश जाना ही चाहिए कि शिक्षक अब छात्रों के साथ इस तरह का गरिमाहीन व्यवहार नहीं कर सकते.
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-भारत एक्सप्रेस
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