Assembly Election Result Analysis: सुवेंदु ने नतीजों के बाद कहा था कि वार्ड नंबर 77 में, वोट देने आए सभी मुसलमानों ने ममता को वोट दिया. भवानीपुर में CPM के 13,000 वोट थे, और उनमें से कम से कम 10,000 मुझे मिले. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है. एक आम मतदाता ईवीएम (EVM) का बटन दबाते हुए यही सोचता है कि उसने किसे चुना, यह बात मशीन के अलावा कोई नहीं जानता. लेकिन जब चुनाव के नतीजे आते हैं तो तस्वीर बिल्कुल अलग होती है. जीतने या हारने वाला उम्मीदवार अगले ही दिन सीना ठोककर कहता है कि उस मोहल्ले ने हमें बंपर वोट दिए या फलां वार्ड और गांव के लोगों ने हमें निराश किया. आखिर नेताओं को यह कैसे पता होता है?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भवानीपुर जैसी हाई-प्रोफाइल सीट जीतने के बाद बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी का बयान भी कुछ ऐसा ही था. उनके बयान में इतनी सटीक और माइक्रो-लेवल (Micro-level) की जानकारी(wb assembly election result analysis) थी, जो आमतौर पर पब्लिक डोमेन में होती ही नहीं है.
अब सवाल यह उठता है कि आखिर सुवेंदु अधिकारी जैसे नेताओं को यह ‘सीक्रेट’ डेटा मिलता कहां से है? उन्हें कैसे पता चलता है कि किस वार्ड, मोहल्ले या राजनीतिक विचारधारा वाले इलाके ने किस तरफ एकमुश्त वोटिंग की? आइए समझते हैं चुनाव आयोग की इस तकनीकी प्रक्रिया और राजनीतिक दलों के डेटा मैनेजमेंट का पूरा खेल.
वोटर की निजता बरकरार रहती है (यानी यह पता नहीं चलता कि राम या श्याम ने किसे वोट दिया), लेकिन पूरे मोहल्ले या गांव का मूड चुनाव प्रक्रिया की कुछ व्यवस्थाओं के कारण नेताओं के सामने शीशे की तरह साफ हो जाता है. इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
भारत में चुनाव ईवीएम (EVM) के जरिए होते हैं और हर ईवीएम एक विशेष पोलिंग बूथ से जुड़ी होती है. एक पोलिंग बूथ आमतौर पर किसी गांव, मोहल्ले के एक हिस्से या किसी खास वार्ड के कुछ घरों को ही कवर करता है. मतगणना के दिन काउंटिंग टेबल पर जब एक-एक करके ईवीएम खोली जाती है, तो वहां खड़े उम्मीदवारों के काउंटिंग एजेंट्स को पता होता है कि मशीन नंबर ‘X’ फलां गांव या वार्ड नंबर XX के बूथ की है. मशीन खुलते ही उस इलाके का पूरा वोटिंग पैटर्न उजागर हो जाता है.
फॉर्म 17C: मतदान खत्म होने के बाद पीठासीन अधिकारी (Presiding Officer) यह फॉर्म भरता है. इसमें दर्ज होता है कि उस विशेष बूथ पर कुल कितने वोट पड़े. इसकी एक कॉपी बूथ पर मौजूद सभी पार्टियों के एजेंट को दी जाती है.
फॉर्म 20 (Final Result Sheet): मतगणना के बाद चुनाव अधिकारी यह फॉर्म तैयार करते हैं, जिसमें बूथ-वार प्राप्त वोटों का पूरा विवरण होता है. इसमें स्पष्ट लिखा होता है: ‘बूथ नंबर 1 (प्राथमिक विद्यालय, गांव ‘A’) – प्रत्याशी 1, प्रत्याशी 2 को कितने-कितने वोट मिले.
चूंकि पार्टियां पहले से जानती हैं कि किस बूथ क्षेत्र में कौन सी जाति, धर्म या समुदाय रहता है, इसलिए ‘फॉर्म 20’ आते ही पूरा गणित डिकोड हो जाता है.
बड़ी राजनीतिक पार्टियां अपने पास ‘पन्ना प्रमुख’ या ‘बूथ लेवल एजेंट’ रखती हैं. उन्हें अपने बूथ के एक-एक घर और उनके राजनीतिक झुकाव का अंदाजा होता है. जब काउंटिंग टेबल से एजेंट डेटा नोट करके पार्टी मुख्यालय भेजता है, तो वहां बैठा सॉफ्टवेयर कुछ ही मिनटों में बता देता है कि पिछली बार के मुकाबले किस बूथ (जैसे सीपीएम के प्रभाव वाले बूथ) के वोट खिसक कर बीजेपी या टीएमसी के पास आ गए.
कई सालों से चुनाव सुधारों के तहत यह मांग उठती रही है कि भारत में ‘टोटलाइजर’ (Totalizer) मशीन का इस्तेमाल किया जाए. यह एक ऐसी तकनीक है जो 14 ईवीएम मशीनों को केबल के जरिए एक साथ जोड़ देती है और फिर सभी मशीनों के वोटों को मिलाकर एक साथ परिणाम दिखाती है.
टोटलाइजर से यह पता लगाना असंभव हो जाएगा कि किस विशेष बूथ, गांव या वार्ड ने किस पार्टी को कितने वोट दिए. परिणाम सिर्फ निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर दिखेंगे. माना जाता है कि बूथ-वार डेटा पता चलने से जीतने वाले नेता चुनाव के बाद उन गांवों या मोहल्लों से ‘बदला’ ले सकते हैं, जहां से उन्हें वोट नहीं मिले.
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भारत में फिलहाल टोटलाइजर का इस्तेमाल नहीं होता है. नतीजतन, बूथ-वार आंकड़े पूरी तरह पारदर्शी रहते हैं और उम्मीदवारों के डेटाबेस में हमेशा के लिए दर्ज हो जाते हैं. यही वजह है कि सुवेंदु अधिकारी हों या कोई अन्य नेता, वे सीना ठोककर यह बताने में सक्षम होते हैं कि “किस वार्ड ने सिर आंखों पर बिठाया और किसने निराश किया.
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