Collector Gargi Jain
गुजरात के छोटा उदयपुर जिले में एक अनोखी पहल ने यह साबित कर दिया है कि अगर प्रशासन सिर्फ दफ्तर तक सीमित न रहे और लोगों के बीच जाकर काम करे, तो बदलाव संभव है. जिले की कलेक्टर गर्गी जैन (Gargi Jain) ने पिछले एक साल से आदिवासी इलाकों के स्कूलों में नियमित रूप से जाकर छात्राओं से संवाद शुरू किया. इसका असर इतना सकारात्मक रहा कि लड़कियों के स्कूल छोड़ने यानी ड्रॉपआउट की दर में करीब 60 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई.
अक्सर अधिकारी अपनी बैठकों और फाइलों में व्यस्त रहते हैं, लेकिन छोटा उदयपुर की कलेक्टर गर्गी जैन ने अलग रास्ता चुना. उन्होंने तय किया कि वे हर सप्ताह आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों में जाएंगी, छात्राओं के बीच बैठेंगी और उनसे खुलकर बात करेंगी.
इन मुलाकातों में पढ़ाई के साथ-साथ जीवन से जुड़े कई अहम मुद्दों पर चर्चा होती है. लड़कियों को कानूनी अधिकारों की जानकारी दी जाती है, आत्मविश्वास बढ़ाने की कोशिश की जाती है और उन्हें समाज की कुरीतियों का सामना करने के लिए तैयार किया जाता है. यही वजह है कि छात्राएं उन्हें अब सिर्फ एक अधिकारी नहीं, बल्कि “कलेक्टर दीदी” के नाम से जानने लगी हैं.
कलेक्टर गर्गी जैन का कहना है कि उनका लक्ष्य सिर्फ बच्चों को स्कूल में बनाए रखना नहीं है, बल्कि उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करना भी है. उन्होंने पांच आदिवासी बेटियों को भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) अधिकारी बनाने का लक्ष्य रखा है और इसके लिए वे उन्हें लगातार मार्गदर्शन देने की बात कहती हैं. कई छात्राएं अपने करियर, परिवार और निजी परेशानियों को भी उनके साथ बिना झिझक साझा करती हैं. इस भरोसे ने उनके और छात्राओं के बीच एक मजबूत रिश्ता बना दिया है.
छात्राओं के भीतर सुरक्षा और आत्मविश्वास की भावना विकसित करने के लिए गर्गी जैन ने अपनी जिंदगी का एक बेहद निजी अनुभव भी साझा किया. उन्होंने बताया कि बचपन में जब वे अपनी मां के साथ बस से सफर कर रही थीं, तब एक सहयात्री ने उनके साथ “बैड टच” किया था. उस समय वे छोटी थीं और लंबे समय तक इस घटना के बारे में किसी को बता नहीं सकीं.
अब वे स्कूलों में छात्राओं को “गुड टच” और “बैड टच” के बीच का अंतर विस्तार से समझाती हैं, ताकि कोई भी बच्ची ऐसी स्थिति में चुप न रहे और समय रहते अपनी बात परिवार या भरोसेमंद व्यक्ति तक पहुंचा सके.
जिले में वर्ष 2025 के दौरान करीब 9,000 बच्चे स्कूल छोड़ चुके थे. प्रशासन के लगातार प्रयासों और विभिन्न सरकारी योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के बाद वर्ष 2026 में यह संख्या घटकर लगभग 5,500 रह गई. यानी करीब 4,500 बच्चे दोबारा शिक्षा से जुड़े और कुल ड्रॉपआउट में लगभग 39 प्रतिशत की कमी आई. खास बात यह रही कि लड़कियों के ड्रॉपआउट में करीब 60 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई, जिसे इस पहल की बड़ी सफलता माना जा रहा है.
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छोटा उदयपुर की यह पहल दिखाती है कि शिक्षा में सुधार सिर्फ नई योजनाओं या बजट से नहीं आता, बल्कि नियमित संवाद, भरोसे और संवेदनशील नेतृत्व से भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है. जब प्रशासन बच्चों के बीच पहुंचकर उनकी समस्याओं को समझता है और समाधान का रास्ता साथ मिलकर खोजता है, तो उसके नतीजे जमीन पर साफ दिखाई देते हैं. आदिवासी बेटियों की शिक्षा को लेकर शुरू हुई यह पहल अब दूसरे जिलों के लिए भी एक प्रेरणादायक मॉडल बनती नजर आ रही है.
-भारत एक्सप्रेस
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