DU Fake Research Paper Case
DU Fake Research Paper Case: दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) से जुड़े कथित फर्जी रिसर्च पेपर और नौकरी दिलाने के नाम पर धोखाधड़ी के मामले में बड़ा खुलासा हुआ है. उत्तर-पश्चिम दिल्ली के शालीमार बाग थाना पुलिस ने अदालत के निर्देश पर दिल्ली विश्वविद्यालय के दो असिस्टेंट प्रोफेसरों समेत तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है. मामले में धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं. पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है.
एफआईआर के अनुसार, शिकायतकर्ता, जो स्वयं एक असिस्टेंट प्रोफेसर हैं, ने आरोप लगाया है कि वर्ष 2022 में आरोपियों ने उनसे कहा था कि दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के लिए प्रतिष्ठित जर्नल में रिसर्च पेपर प्रकाशित होना आवश्यक है. आरोप है कि इसी बहाने उनसे करीब एक लाख रुपये लिए गए और तीन रिसर्च पेपर प्रकाशित कराने का दावा किया गया. बाद में उन्हें कथित तौर पर इन प्रकाशनों की प्रतियां और प्रमाणपत्र भी उपलब्ध कराए गए, जिससे उन्हें विश्वास हो गया कि उनके शोध पत्र मान्य जर्नल में प्रकाशित हो चुके हैं.
शिकायत के मुताबिक, वर्ष 2023 में शिकायतकर्ता की दिल्ली विश्वविद्यालय के भारती कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति हुई. लेकिन अगस्त 2024 में कॉलेज प्रशासन द्वारा दस्तावेजों की जांच के दौरान रिसर्च पेपरों की प्रमाणिकता पर सवाल उठे. इसके बाद शिकायतकर्ता ने संबंधित प्रकाशकों से संपर्क किया, जहां से कथित तौर पर जानकारी मिली कि जिन शोध पत्रों के प्रकाशन का दावा किया गया था, वे फर्जी थे और उनके नाम पर जारी दस्तावेज भी वास्तविक नहीं थे.
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एफआईआर में यह भी आरोप लगाया गया है कि जब शिकायतकर्ता ने आरोपियों से इस मामले में जवाब मांगा, तो उनसे कथित तौर पर 25 लाख रुपये की मांग की गई. शिकायतकर्ता का दावा है कि आरोपियों ने कहा कि यदि यह रकम दी जाए तो उनकी नौकरी बचाई जा सकती है और मामला सुलझा दिया जाएगा. हालांकि, ऐसा नहीं हुआ और बाद में उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं. इसके बाद उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसके निर्देश पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की.
शालीमार बाग थाना पुलिस का कहना है कि मामले की जांच सभी पहलुओं से की जा रही है. पुलिस कथित फर्जी रिसर्च पेपर, प्रकाशन से जुड़े दस्तावेज, वित्तीय लेन-देन और अन्य साक्ष्यों की जांच कर रही है. साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि आरोपों में कितनी सच्चाई है और क्या किसी संगठित तरीके से फर्जी प्रकाशनों का नेटवर्क संचालित किया जा रहा था.
फिलहाल इस मामले में दर्ज एफआईआर शिकायतकर्ता के आरोपों पर आधारित है. अभी तक आरोपियों का पक्ष सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है और न ही किसी अदालत ने उन्हें दोषी ठहराया है. पुलिस का कहना है कि जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी. ऐसे में आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों के आधार पर की जाएगी.
भारत एक्सप्रेस
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