राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का हफ्तों से चल रहा आंदोलन अब समाप्त हो चुका है. वहीं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के अपने पद से इस्तीफे और लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक द्वारा 26 दिनों बाद अनशन तोड़े जाने के बाद प्रदर्शनकारियों ने धरना खत्म करने का ऐलान कर दिया.
हालांकि, जंतर-मंतर से टेंट और बैनर भले ही हट गए हों, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA बिल पर एक नई और तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है. लेकिन आखिर यह बिल क्या है, यह भारत में विदेशी फंड से चलने वाले संगठनों को कैसे प्रभावित करता है और सरकार के इस कदम को एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक क्यों माना जा रहा है, आइए इसे आसान भाषा में विस्तार से समझते हैं.
जब भी देश में कोई बड़ा विरोध-प्रदर्शन या सामाजिक आंदोलन लंबा खींचता है, तो नीति निर्माताओं और सुरक्षा एजेंसियों का ध्यान इस बात पर जाता है कि ऐसे आयोजनों का वित्तीय ढांचा क्या है. अक्सर विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों और ट्रस्टों के जरिए देश में सामाजिक कार्यों के नाम पर विदेशी पैसा आता है.
हालांकि कई NGO समाज सेवा का बेहतरीन काम करते हैं, लेकिन सरकार और जांच एजेंसियों की नजर इस बात पर रहती है कि कहीं विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल देश की आंतरिक व्यवस्था और जन-भावनाओं को प्रभावित करने के लिए तो नहीं हो रहा. यही वजह है कि जब भी जंतर-मंतर जैसे बड़े विरोध प्रदर्शन समाप्त होते हैं, तो विदेशी चंदे की पारदर्शिता और FCRA के कड़े नियमों पर बहस अपने आप तेज हो जाती है.
FCRA का पूरा नाम फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट है, जिसे पहली बार 1976 में लागू किया गया था और बाद में 2010 में इसे व्यापक रूप से अपडेट किया गया. यह कानून भारत के गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है. इसका प्राथमिक उद्देश्य भारत में किसी भी व्यक्ति, NGO, चैरिटी या संस्थान द्वारा विदेश से प्राप्त किए जाने वाले दान, सहायता और फंडिंग को पूरी तरह से ट्रैक और रेगुलेट करना है. इस कानून का सीधा सिद्धांत यह है कि विदेशी पैसों का इस्तेमाल भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक प्रक्रिया, आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द के खिलाफ न किया जा सके.
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संसद में मार्च में पेश किए गए FCRA संशोधन बिल पर नाकामी मिलने के बाद अब यह बिल वापिस इस सत्र में लौट आया है, जिसमें सरकार इसको पास कराने की पूरी कोशिश करेगी. इस बिल (FCRA Bill Explained) की सबसे बड़ी बात यह है कि यदि किसी NGO का FCRA लाइसेंस रद्द होता है, एक्सपायर होता है या संगठन उसे सरेंडर करता है, तो उसकी विदेशी फंड से बनाई गई सभी संपत्तियां एक डेज़िग्नेटेड अथॉरिटी यानी सरकारी प्राधिकरण के पास जब्त हो जाएंगी.
पहले ऐसी संपत्तियों को लेकर कानूनी स्पष्टता की कमी थी, जिससे अरबों रुपये की संपत्तियां अधर में लटकी रहती थीं. अब सरकार ने साफ कर दिया है कि समय पर रिन्यूअल न कराने या लाइसेंस खत्म होने पर उन संपत्तियों का इस्तेमाल सार्वजनिक हित में किया जाएगा.
विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता लाना किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम माना जाता है. दुनिया के लगभग सभी बड़े लोकतांत्रिक देश अपने यहां आने वाले विदेशी पैसों का कड़ा हिसाब-किताब रखते हैं. सरकार का मानना है कि FCRA कानून का मकसद जायज सामाजिक कार्यों, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के लिए आने वाले विदेशी दान को रोकना बिल्कुल नहीं है.
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-भारत एक्सप्रेस
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