(AI IMAGE)
IIT Kanpur Study: हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और मैदानी इलाकों में अत्यधिक भूजल दोहन ने वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा दी है. आईआईटी कानपुर के शोधकर्ताओं के अनुसार, यह संतुलन बिगड़ने से आने वाले समय में भीषण भूकंप का खतरा बन सकता है.
आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से चट्टानों पर बना बर्फ का वजन कम हो रहा है, जिसे ‘आइसोस्टेटिक बैलेंस’ या ‘अनलोडिंग’ कहा जाता है. इस प्रक्रिया के कारण भूगर्भीय प्लेटें ऊपर की ओर खिसक सकती हैं और दबाव कम होने से दरारों में पानी जाकर चट्टानों को कमजोर कर सकता है, जिससे हिमालयी क्षेत्र में 8.5 तीव्रता तक के भीषण भूकंप का खतरा बढ़ गया है. इसके साथ ही, 2015 के नेपाल भूकंप की अधूरी ऊर्जा, लंबे समय से शांत ‘सेंट्रल सेस्मिक गैप’, और गंगा के मैदानी इलाकों में अत्यधिक भूजल दोहन से जमीन धंसने की समस्याएं इस भूगर्भीय जोखिम को और अधिक गंभीर बना रही हैं.
आईआईटी कानपुर के अर्थ साइंसेज विभाग के प्रोफेसर जावेद एन. मलिक के अनुसार, ग्लेशियरों पर मौजूद बर्फ चट्टानों पर भारी दबाव बनाए रखती है. भूगर्भ में यूरेशियन और तिब्बती प्लेटों के टकराव से चट्टानों में दरारें बनती हैं. यदि ग्लेशियर पिघलते हैं, तो पानी इन दरारों में जाकर चट्टानों की मजबूती कम कर देता है. बर्फ हटने से प्लेटों पर दबाव घटता है, जिससे भूगर्भीय प्लेटें ऊपर की ओर उठती हैं. विज्ञान में इसे ‘आइसोस्टेटिक बैलेंस’ कहा जाता है, और ‘अनलोडिंग’ की यह प्रक्रिया हिमालय में बड़े भूकंप की वजह बन सकती है.
वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय की क्षमता अधिकतम 8.5 मैग्नीट्यूड तक के भूकंप झेलने की है. साल 2015 में नेपाल में आए भूकंप से पूरी भूगर्भीय ऊर्जा बाहर नहीं निकली थी, जिसके कारण अगले 50 से 100 वर्षों में नेपाल और आसपास के क्षेत्रों में नए तीव्र भूकंप आने की प्रबल आशंका बनी हुई है. इसके साथ ही, 20वीं सदी के बाद से मध्य हिमालयी क्षेत्र में कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है, जिसे ‘सेंट्रल सेस्मिक गैप’ कहा जाता है. इसी वजह से पंजाब, हिमाचल प्रदेश और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील बने हुए हैं.
हिमालय के अलावा, गंगा के मैदानी इलाकों में खेती और अन्य जरूरतों के लिए हो रहा अंधाधुंध भूजल दोहन भी बड़ी समस्या पैदा कर रहा है. जमीन के नीचे से अत्यधिक पानी खींचने से मिट्टी और बालू के बीच खाली जगह बनती है, जिससे ‘कॉम्पैक्शन’ की स्थिति पैदा होती है और मैदानी इलाकों की जमीन धंसने लगती है. चंडीगढ़ और पंजाब में स्थापित जीपीएस (GPS) स्टेशनों के आंकड़ों से भी इस अनलोडिंग और जमीन धंसने (Land Subsidence) की पुष्टि होती है.
वैश्विक स्तर पर देखें तो रूस, वेनेजुएला, जापान में लगातार आ रहे भूकंप और इंडोनेशिया में ज्वालामुखी फटने की घटनाएं आपस में जुड़ी हुई हैं. इसे ‘रिंग ऑफ फायर’ (Ring of Fire) कहा जाता है, जहां पेसिफिक प्लेट लगातार नीचे की ओर दब रही है. हालांकि पृथ्वी के गर्भ में यह सेस्मिक गतिविधियां हर सदी में घटती-बढ़ती रहती हैं, लेकिन मानव द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से यह प्राकृतिक जोखिम और अधिक गंभीर रूप ले रहा है.
यह भी पढ़ें-गड्ढे ने रोका यमराज का रास्ता: श्मशान जा रही थी एम्बुलेंस, रास्ते में हुआ कुछ ऐसा कि जिंदा हो गया मृत शख्स
-भारत एक्सप्रेस
Antaragni 2026 IIT Kanpur Bharat Express: IIT कानपुर में 29 अक्टूबर से 1 नवंबर तक…
इमरान खान को FRRO द्वारा भारत छोड़ने का नोटिस मिलने के बाद मामला बॉम्बे हाईकोर्ट…
Lieutenant Governor Dr Dinesh Sharma Andaman tourism festival: अंडमान-निकोबार के LG डॉ. दिनेश शर्मा ने…
Indian Defence Deals: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई DAC बैठक में भारतीय…
Donald Trump Global Influence: डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले दो वर्षों में आठ देशों के चुनावों…
गाजियाबाद के सनसिटी में छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन पर आधारित महानाट्य 'जाणता राजा' के…