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Joshimath Sinking: ‘लगता है कयामत आने वाली है’- दहशत में शहर के लोग, जोशीमठ में तेजी से बढ़ रही दरारें

Joshimath Sinking: उत्तराखंड के जोशीमठ को भूस्खलन और धंसाव क्षेत्र घोषित किए जाने के बाद राहत और बचाव के कार्य तेज किए गए हैं. उत्तराखंड के मुख्य सचिव सुखबीर सिंह संधू ने जमीनी स्थिति का जायजा लेने के लिए जोशीमठ के प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया. राज्य के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) अशोक कुमार और मुख्यमंत्री की सचिव आर. मीनाक्षी सुंदरम के साथ संधू ने जमीन धंसने से बुरी तरह प्रभावित मनोहर बाग, सिंगधार और मारवाड़ी इलाकों का निरीक्षण किया.

स्थानीय लोगों में दहशत

वहीं जमीन में दरारें तेजी से बढ़ रही हैं. स्थानीय लोग इसे अपशगुन मान रहे हैं और किसी बड़ी अनहोनी की आशंका से भयभीत नजर आ रहे हैं. उनका कहना है कि ये आने वाली कयामत की वजह बन सकता है. दूसरी तरफ, एक स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता ने जोशीमठ और उसके आसपास कई सुरंगों और जलविद्युत परियोजनाओं को अपूरणीय क्षति के लिए जिम्मेदार ठहराया है. उन्होंने कहा कि उनकी आवाज को खुले तौर पर नजरअंदाज किया गया है.

भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी, इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के अनुसंधान निदेशक और सहायक एसोसिएट प्रोफेसर व आईपीसीसी रिपोर्ट के प्रमुख लेखक अंजल प्रकाश का कहना है जलवायु परिवर्तन एक वास्तविकता बन रहा है. स्थानीय अधिकारी पर्यावरण के साथ इस हद तक खिलवाड़ कर रहे हैं जो अपरिवर्तनीय है. उन्होंने कहा, “जोशीमठ समस्या के दो पहलू हैं – पहला बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का विकास है, जो हिमालय जैसे बहुत ही नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहा है और यह एक तरह से बिना किसी नियोजन प्रक्रिया के हो रहा है.”

विशेषज्ञ ने क्या कहा

उन्होंने कहा, “दूसरी बात, जलवायु परिवर्तन एक बल गुणक है. जिस तरह से कुछ पहाड़ी राज्यों में जलवायु परिवर्तन प्रकट हो रहा है वह अभूतपूर्व है. उदाहरण के लिए 2021 और 2022 उत्तराखंड के लिए आपदा के वर्ष रहे हैं. अत्यधिक वर्षा जैसी कई जलवायु जोखिम घटनाएं दर्ज की गई हैं, जो भूस्खलन का कारण बनती हैं.” अंजल प्रकाश ने कहा, “हमें पहले यह समझना होगा कि ये क्षेत्र बहुत नाजुक हैं और पारिस्थितिकी तंत्र में छोटे बदलाव या गड़बड़ी गंभीर आपदाओं को जन्म देगी, जो हम जोशीमठ में देख रहे हैं. वास्तव में, हिमालयी क्षेत्र में यह इतिहास का एक विशेष बिंदु है, जिसे इस रूप में याद किया जाना चाहिए.”

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हीम, अर्नोल्ड और ऑगस्ट गांसर की पुस्तक ‘सेंट्रल हिमालय’ के अनुसार, चमोली जिले का जोशीमठ कस्बा भूस्खलन के मलबे पर बसा है. कुछ घरों ने पहले ही 1971 में दरारों की सूचना दी थी, जिसके बाद एक रिपोर्ट ने कुछ उपायों का सुझाव दिया था, जिसमें मौजूदा पेड़ों का संरक्षण और अधिक पेड़ लगाना शामिल था, जिन पत्थरों पर शहर स्थित है, उन्हें छुआ नहीं जाना चाहिए और सीमेंट कंक्रीट (आरसीसी) से मजबूत करना चाहिए.

वाई.पी. एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग के प्रमुख सुंदरियाल के मुताबिक, इन उपायों का कभी पालन नहीं किया गया.  कई विशेषज्ञों ने बताया कि पारंपरिक आवास निर्माण प्रौद्योगिकियां नवनिर्मित बुनियादी ढांचे की तुलना में भूकंप और भूस्खलन का अधिक मजबूती से सामना करने में सक्षम हैं. मौजूदा हालात के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, जोशीमठ में चल रहा संकट मुख्य रूप से मानवजनित गतिविधियों के कारण है.

-भारत एक्सप्रेस

कमल तिवारी

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