भारत में अगर किसी संस्था पर सबसे गहरा भरोसा है तो वह LIC यानी भारतीय जीवन बीमा निगम है. यह सिर्फ एक बीमा कंपनी नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के सपनों और सुरक्षा का प्रतीक है. हालांकि, वॉशिंगटन पोस्ट जैसे विदेशी अखबार इसपर लांछन लगाने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ दिनों पहले अमेरिका के अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने एक रिपोर्ट छापी जिसमें भारतीयों के भरोसे वाली कंपनी पर बेबुनियाद आरोप लगाए गए. हालांकि, कंपनी लगातार मुनाफे में है और भारतीयों का इसपर विश्वास अडिग है. क्योंकि, हर मौके पर भारतीय जीवन बीमा निगम लोगों के साथ खड़ी होती है.
यानी भारतीय जीवन बीमा निगम सिर्फ एक बीमा कंपनी नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों के सपनों और सुरक्षा का प्रतीक है. छोटे शहर के शिक्षक से लेकर महानगर के पेशेवर तक, हर कोई अपने भविष्य की गारंटी के रूप में LIC को देखता है. किसी की बेटी की शादी हो, किसी का मकान बनाना हो या सेवानिवृत्ति का सहारा हर जगह एलआईसी मौजूद है.
महाराष्ट्र के सतारा के रमेश पाटिल जैसे लोग इसके उदाहरण हैं. पाटिल ने 25 साल पहले एलआईसी की पॉलिसी ली थी. जब 2025 में उनकी बेटी की शादी का समय आया तो वही पॉलिसी उनके लिए वरदान साबित हुई. रमेश मुस्कुराते हुए कहते हैं कि कंपनियां आती जाती हैं पर एलआईसी हमेशा साथ देती है.
इसी भरोसे की जड़ें बहुत गहरी हैं. आजादी के बाद जब देश का वित्तीय ढांचा बन रहा था तब 1956 में एलआईसी की स्थापना हुई. उसने तब से लेकर अब तक हर आर्थिक संकट, हर सरकार और हर बदलते दौर में लोगों का पैसा सुरक्षित रखा है. 1991 के आर्थिक सुधार हों या कोविड-19 महामारी, एलआईसी ने हमेशा अपनी साख बनाए रखी.
एलआईसी सिर्फ़ बीमा नहीं बेचती, भरोसा बेचती है. हर गांव में उसका एजेंट परिवार का सदस्य जैसा बन जाता है. शायद इसी वजह से आज भी भारत में 30 करोड़ से ज़्यादा पॉलिसियां सक्रिय हैं. यह किसी निजी कंपनी के लिए असंभव आंकड़ा है.
जब वॉशिंगटन पोस्ट जैसी विदेशी मीडिया ने अक्टूबर 2025 में एलआईसी पर अडाणी समूह को मदद पहुंचाने का आरोप लगाया तो लोगों ने इस खबर पर हंसी में प्रतिक्रिया दी. उन्हें पता था कि LIC का निवेश नीति के दायरे में पूरी जांच-पड़ताल के बाद होता है. और जब एलआईसी ने बताया कि अडाणी निवेश उसके कुल पोर्टफोलियो का 1% से भी कम है और उस पर उसे 120% का मुनाफा हुआ है तो लोगों का भरोसा और मजबूत हो गया.
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ऐसे समय पर जब भारत में बिहार विधानसभा चुनाव के चलते लोकतंत्र का उत्सव चल रहा है, वॉशिंगटन पोस्ट जैसी संस्थाओं की बिना आधार वाली रिपोर्टें उन पत्रकारों की LIC पर हमले की एक सोची समझी रणनीति लगती हैं, जिनके राजनीतिक संरक्षक जनता का विश्वास खो चुके हैं और चुनावों में लगातार नाकाम रहे हैं.
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