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सरकारी खजाने पर ‘सर्जरी’ चुनावी महामंत्र, महिलाओं को नगद ट्रांसफर से दलदल में राज्य; PRS रिपोर्ट एक चेतावनी

Women Cash Transfer Schemes: देश की राजनीति इन दिनों महिला कल्याण के एक नए रंग में रंगी हुई है, पर अफसोस, यह रंग राजनेताओं की जेब से नहीं, बल्कि सरकारी खजाने से उड़ेलकर भरा जा रहा है. चुनाव के मैदान में उतरने से पहले, हर पार्टी अब महिलाओं को सीधे नकद लाभ देने की होड़ में है. ऐसा लगता है, जैसे चुनाव जीतने का मंत्र अब विकास नहीं, बल्कि ‘सीधा बैंक खाते में ट्रांसफर’ बन गया है. दल तो जीत जाते हैं, लेकिन पीछे छोड़ जाते हैं राज्यों को आर्थिक दलदल में. बिहार चुनाव में भी ‘मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना’ इसका एक ताजा उदाहरण है, जहां जीत के लिए चुनावी ‘लक्ष्मी’ को प्रसन्न करने की परंपरा जोर पकड़ रही है.

देशभर में चुनावी साल आते ही महिलाओं को सीधे नकद सहायता (Women Cash Transfer Schemes) देने की योजनाओं की बाढ़ आ गई है, लेकिन यह ‘तोहफों की राजनीति’ अब राज्यों की वित्तीय सेहत पर भारी पड़ने लगी है. PRS लेजिस्लेटिव रिसर्च की ताजा रिपोर्ट (PRS report On Women Cash transfer schemes) के अनुसार, 12 राज्य इस वर्ष 1,68,050 करोड़ रुपये सिर्फ नकद हस्तांतरण योजनाओं पर खर्च करेंगे. यह देश के GDP का 0.5% है.

योजनाएं महिलाओं को आर्थिक ताकत देने का दावा करती हैं, लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि चुनाव से पहले ये महिलाओं तक सीधे पहुंचने का सबसे आसान और प्रभावी तरीका बन गई हैं. देश के कई राज्यों में अब महिलाओं को सीधे पैसे देने की योजनाएं चल रही हैं.

पार्टियों ने बनाई जीत की रणनीति (Unconditional Women Cash transfer schemes)

देश में पिछले कुछ वर्षों से एक नया राजनीतिक ट्रेंड चल रहा है. महिलाओं को नगद लाभ देकर चुनाव जीतने का. यह रणनीति इतनी प्रभावी साबित हुई है कि अब यह पार्टियों की नई सामाजिक-राजनीतिक रणनीति बन चुकी है. क्योंकि, उन्हें इसपर अच्छे खासे वोट मिलते हैं.

  • 2022-23 में सिर्फ 2 राज्य में बिना शर्त नकद योजना थी.
  • 2025-26 में अब यह संख्या बढ़कर 12 राज्यों तक पहुंच गई है.
  • चालू वित्त वर्ष 12 राज्य इन योजनाओं पर 1,68,050 करोड़ खर्च करेंगे.
  • यह खर्च GDP का लगभग 0.5% है जो 2 साल पहले 0.2%.

12 राज्यों में चल रही योजनाएं (Women Cash transfer schemes in 12 states)

चाहे लाड़ली, लक्ष्मी, या बहिन… नाम कोई भी हो, हर राजनीतिक दल अब महिलाओं को सीधे नकद राहत देने की होड़ में है, खासकर उन राज्यों में जहां चुनाव आने वाले हैं. मध्य प्रदेश से शुरू हुआ ये सिलसिला अब करीब 12 राज्यों में पहुंच गया है. इसमें कर्नाटक में ‘गृह लक्ष्मी’, महाराष्ट्र में ‘लाडकी बहिन’ जैसी योजनाएं शामिल हैं.

चुनाव से पहले बढ़ाई गई राशि (Election year Women Cash transfer schemes)

जिन राज्यों में आगामी वर्ष में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां इन योजनाओं के लिए आवंटित राशि में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है. असम में पिछले वित्त वर्ष की तुलना में इन योजनाओं के लिए 31% अधिक राशि आवंटित की गई. पश्चिम बंगाल में यह वृद्धि 15% रही है. झारखंड ने भी अपनी ‘मुख्यमंत्री मायन सम्मान योजना’ की मासिक राशि 1,000 से बढ़ाकर 2,500 कर दी.

नकद खर्च से बढ़ता राजस्व घाटा

वित्तीय दबाव बढ़ने पर कुछ राज्यों को कटौती भी करनी पड़ी है. 12 राज्यों में से 6 राज्यों ने वर्ष 2025-26 के लिए राजस्व घाटे का अनुमान लगाया है. अगर नकद योजनाओं के खर्च को हटा दिया जाए, तो इन राज्यों की राजस्व स्थिति बेहतर दिखती है. कर्नाटक का राजस्व संतुलन इन योजनाओं के कारण 0.3% अधिशेष से सीधे 0.6% घाटे में पहुंच जाता है.

  • महाराष्ट्र ने अपनी ‘लाडकी बहिन योजना’ की राशि को कम कर दिया.
  • मध्य प्रदेश में अधिशेष 1.1% से घटकर केवल 0.4% पर पहुंच गया.
  • कर्नाटक का राजस्व संतुलन 0.3% अधिशेष से घटकर 0.6% पर पहुंच गया.

अप्रैल 2025 में, महाराष्ट्र ने CM लाड़की बहिन योजना के तहत मिलने वाला मासिक लाभ 1,500 से घटाकर 500 कर दिया. यह उन महिलाओं के लिए किया गया जो महिला किसानों के लिए राज्य सरकार की एक और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम के तहत हर महीने 1,000 पा रही थीं.

सियासतदानों समझना होगा आर्थिक सेहत (RBI warns Cash transfer schemes)

यह नकद तोहफों की लहर भले ही लघुकालीन राजनीतिक लाभ दे, लेकिन दीर्घकाल में राज्यों के वित्तीय अनुशासन के लिए यह एक बड़ा खतरा पैदा कर रही है. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने राज्यों को पहले ही गंभीर चेतावनी दी है कि बढ़ती सब्सिडियों और नकद हस्तांतरण योजनाओं से राज्यों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ रहा है. 1.68 लाख करोड़ का यह भारी खर्च राजस्व घाटे को बढ़ा रहा है.

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राजनीतिक दलों को समझना होगा कि राज्य का दलदल में जाना किसी भी जीत को फीका कर देगा. महिला सशक्तिकरण जरूरी है, लेकिन चुनावी वर्ष में खजाना लुटाकर नहीं, बल्कि वित्तीय स्थिरता और उत्पादक निवेश को प्राथमिकता देकर. इन लोकलुभावन रणनीतियों पर अंकुश लगाना और राज्यों की वित्तीय स्थिरता बनाए रखना अब सबसे बड़ी राष्ट्रीय चुनौती बन चुकी है.

Shyamdatt Chaturvedi

श्यामदत्त चतुर्वेदी एक अनुभवी मीडिया पेशेवर हैं. वर्तमान में नोएडा 'भारत एक्सप्रेस' में पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में सात वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले श्यामदत्त ने हिंदी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए कंटेंट राइटिंग, रिपोर्टिंग, एडिटिंग और डेटा एनालिसिस में गहरी विशेषज्ञता हासिल की है. इससे पहले उन्होंने जी न्यूज, ईटीवी भारत, टीएफआई मीडिया, वे2न्यूज और सैफायर मीडिया लिमिटेड (इंडिया डेली लाइव) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं. उन्होंने स्थानीय पंचायत से लेकर विधानसभा, लोकसभा तक की व्यापक कवरेज की. उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (IGNTU), अमरकंटक से पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातक (BJMC) करने के बाद, प्रतिष्ठित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर डिग्री (M.A.) हासिल की है.

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