भारतीय संसद लोकतंत्र की सबसे बड़ी संस्था है. यहां देश से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा होती है. संसद में हर सांसद को बोलने का अधिकार होता है, चाहे वह सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का. लेकिन हाल ही में जो घटना हुई है, उसने इस अधिकार पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि उन्हें जानबूझकर संसद में बोलने से रोका गया. इस मुद्दे पर उन्होंने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को एक पत्र भी लिखा है. राहुल गांधी का कहना है कि यह केवल उनके साथ अन्याय नहीं है, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए चिंता की बात है.
राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी देश की सुरक्षा से जुड़े एक मुद्दे पर बोलना चाहते थे. उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की एक अनपब्लिश्ड किताब से जुड़े एक दस्तावेज़ का ज़िक्र करना चाहा. स्पीकर ने उनसे उस दस्तावेज़ को प्रमाणित (ऑथेंटिकेट) करने को कहा. नियमों के अनुसार राहुल गांधी ने इसकी जिम्मेदारी ली.
राहुल गांधी का कहना है कि संसदीय परंपरा के मुताबिक, दस्तावेज़ की जिम्मेदारी लेने के बाद सांसद को उस पर बोलने की अनुमति दी जाती है. इसके बाद सरकार उस पर जवाब देती है. लेकिन इसके बावजूद उन्हें बोलने नहीं दिया गया.
स्पीकर को लिखे पत्र में राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें बार-बार बोलने से रोका जा रहा है, खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के अभिभाषण में राष्ट्रीय सुरक्षा एक अहम विषय था और उस पर चर्चा करना विपक्ष के नेता के रूप में उनका अधिकार और कर्तव्य है.
उनका यह भी कहना है कि संसद के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि नेता प्रतिपक्ष को सरकार के कहने पर बोलने से रोका गया हो. राहुल गांधी ने इसे लोकतंत्र पर एक धब्बा बताया है.
लोकसभा स्पीकर का काम होता है कि वे सदन को निष्पक्ष तरीके से चलाएं और हर सांसद के अधिकारों की रक्षा करें. राहुल गांधी ने पत्र में कहा है कि स्पीकर की जिम्मेदारी है कि वे सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों को समान अवसर दें. अगर विपक्ष के नेता को बोलने से रोका जाता है, तो इससे यह संदेश जाता है कि संसद में केवल सरकार की ही बात सुनी जा रही है.
लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बहुत अहम होती है. विपक्ष सरकार से सवाल पूछता है, गलतियों की ओर ध्यान दिलाता है और जनता की आवाज़ उठाता है. अगर विपक्ष को बोलने नहीं दिया जाएगा, तो संसद में सही चर्चा नहीं हो पाएगी.
इस पूरे मामले ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या संसद में असहमति की आवाज़ धीरे-धीरे कमजोर की जा रही है.
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-भारत एक्सप्रेस
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