देश के नए मुख्य सूचना आयुक्त के चयन के लिए बुधवार को चयन समिति की अहम बैठक हुई, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी शामिल हुए. इस दौरान 8 सूचना आयुक्तों के नामों पर फैसला लिया गया था, जिसमें से कुछ नामों पर नेता विपक्ष राहुल गांधी ने असहमति जताई. हालांकि, इस दौरान राहुल गांधी ने जो तर्क दिए थे, वे पूरी तरह से गलत साबित हुए हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सूचना आयुक्तों को चुनने के लिए हुई मीटिंग में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने अपना विरोध दर्ज कराया. उन्होंने आरोप लगाया कि शॉर्टलिस्ट में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, ओबीसी और ईबीसी समुदायों के नाम शामिल नहीं थे. मीडिया के अनुसार, उन्होंने दावा किया कि संवैधानिक और स्वायत्त संस्थानों में नियुक्तियों से एससी, एसटी, ओबीसी, ईबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों को बाहर रखने का एक व्यवस्थित तरीका है.
हालांकि, असलियत कुछ और ही है. केंद्रीय सूचना आयोग की स्थापना 2005 में हुई थी. 2005 से 2014 तक, यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान, एससी/एसटी समुदाय के किसी भी व्यक्ति को आयोग के सदस्य या अध्यक्ष के रूप में नियुक्त नहीं किया गया था. यह एनडीए सरकार थी, जिसने 2018 में एसटी समुदाय के सदस्य सुरेश चंद्र को आयोग में नियुक्त किया.
गौरतलब है कि हीरालाल समरिया अंतिम मुख्य सूचना आयुक्त थे, जिन्होंने 65 वर्ष की आयु पूरी करने के बाद 13 सितंबर को अपना पद छोड़ दिया था. 2020 में हीरालाल सामरिया को सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया और 2023 में वह मुख्य सूचना आयुक्त बने. वह अनुसूचित जाति समुदाय से पहले सीआईसी के रूप में चुने गए थे.
बुधवार को सूचना आयुक्तों के रूप में नियुक्ति के लिए विचार की गई आठ खाली जगहों के संबंध में, सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार ने एक एससी, एक एसटी, एक ओबीसी, एक अल्पसंख्यक प्रतिनिधि और एक महिला के नाम की सिफारिश की. कुल मिलाकर, अनुशंसित आठ नामों में से पांच वंचित वर्गों से थे. इन तथ्यों को देखते हुए, राहुल गांधी के दावे गलत साबित हुए हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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