अनिमेष मुखर्जी की ‘ठाकुरबाड़ी’ एक ऐसी किताब है जो इतिहास को कथा के जादू से बुना हुआ एक अद्भुत वस्त्र प्रतीत होती है. पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर के परिवार के वृत्तांत को केंद्र में रखकर न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन की परतें खोलती है, बल्कि 19वीं और 20वीं सदी के बंगाल के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को भी जीवंत कर देती है. अनिमेष मुखर्जी, जो एक डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर और स्क्रीनराइटर भी हैं. किताब की भाषा सरल, प्रवाहमयी और बातचीत जैसी है, जो पाठक को किसी बुद्धिमान मित्र से गपशप कराने का अहसास देती है.
किताब का शीर्षक ‘ठाकुरबाड़ी’ टैगोर परिवार के प्रसिद्ध जागिरा हाउस को संदर्भित करता है, जो कोलकाता के जोरासांको इलाके में स्थित था. यह महल न केवल परिवार का निवास था, बल्कि बंगाली संस्कृति का एक जीवंत केंद्र भी अनिमेष ने इसे एक धागे की तरह बुना है, जो परिवार के संस्थापक द्वारकानाथ टैगोर से शुरू होकर रबींद्रनाथ तक फैला है. द्वारकानाथ, जिन्हें ‘प्रिंस’ कहा जाता था, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ व्यापारिक साझेदारी से अकूत संपत्ति अर्जित करने वाले पहले भारतीय थे.
किताब बताती है कि जब वे लंदन पहुंचे, तो महारानी विक्टोरिया ने उन्हें निजी डिनर पर आमंत्रित किया, और इंग्लैंड के भावी प्रधानमंत्री विलियम ग्लैडस्टोन उनके मित्र बनना चाहते थे. लेकिन यह वैभव उनकी पत्नी दिग्म्बरी देवी के गुस्से का शिकार भी बना. दिग्म्बरी ने द्वारकानाथ को घर में घुसने नहीं दिया, क्योंकि वे ईसाई महिलाओं के साथ घूमते थे. यह प्रसंग किताब का एक रोचक मोड़ है, जो परिवार के आंतरिक संघर्षों को उजागर करता है.
किताब का मूल आकर्षण महिलाओं की भूमिका में है. अनिमेष ने सही कहा है कि टैगोर परिवार की महिलाएं अक्सर छायामय रहीं, लेकिन उन्होंने बंगाली समाज को नया आकार दिया. ज्ञानदानंदिनी देवी, देवेंद्रनाथ टैगोर की पत्नी, ने साड़ी पहनने का आधुनिक तरीका विकसित किया जिसे ‘ज्ञानदानंदिनी स्टाइल’ कहा जाता है. यह ब्रह्म समाज के सुधारों से प्रेरित था, जहां महिलाओं को पर्दा प्रथा से मुक्त कराया गया. किताब में वर्णन है कि कैसे ज्ञानदानंदिनी ने पेटीकोट के साथ साड़ी को संयोजित कर एक नया फैशन जन्म दिया, जो आज भी प्रासंगिक है.
इसी तरह, रबींद्रनाथ की भाभी कादंबरी देवी की दुखद प्रेम कथा को अनिमेष ने संवेदनशीलता से बुना है. कादंबरी ने रबींद्रनाथ को साहित्यिक प्रेरणा दी, लेकिन उनकी आत्महत्या ने परिवार को हमेशा के लिए आहत कर दिया. अनिमेष की खोजपूर्ण नजर ने इन महिलाओं को नायक बनाया है. वे ना केवल घर संभालती रहीं, बल्कि फैशन, भोजन और शिक्षा में भी क्रांतिकारी साबित हुईं. उदाहरण स्वरूप, प्रतिमा देवी (रतींद्रनाथ टैगोर की पत्नी) ने बाटिक प्रिंट को लोकप्रिय बनाया, जो बंगाली कुर्तों का प्रतीक बन गया.
इतिहास का चित्रण किताब की ताकत है. अनिमेष ने प्लासी की लड़ाई (1757) से बंगाल के आर्थिक पतन को जोड़ा है. ‘प्लासी के बाद नवाबों को धोखा मिला, क्लाइव को पैसा मिला और जनता को अकाल मिला.’ यह वाक्य किताब का सार है. टैगोर परिवार ने ब्रह्म समाज के माध्यम से धार्मिक सुधार किए, लेकिन वे जमींदारी प्रथा के शिकार भी हुए. रबींद्रनाथ ने अपने दादा द्वारकानाथ के दस्तावेज जला दिए, ताकि परिवार का ‘अंग्रेजीकरण’ मिट जाए. किताब में 1902 की एक घरेलू दावत का मेन्यू वर्णित है. क्रमणि कहलाने वाली यह भोज्य सूची पूरी तरह घरेलू थी, जो दर्शाती है कि ठाकुरबाड़ी भारतीय रसोई को कैसे प्रभावित करती रही. अनिमेष ने तत्कालीन इतिहास को कथा से जोड़े रखा है, जैसे बंगाल अकाल (1770) या स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव. यह निष्पक्ष दृष्टि है, ना तो जजमेंटल, न ही पूर्वाग्रही.
किताब की भाषा हिंदी में है, लेकिन बंगाली शब्दों का मिश्रण इसे प्रामाणिक बनाता है. प्रवाह इतना सहज है कि एक सांस में पढ़ी जा सकती है. हालांकि, कुछ जगहों पर ऐतिहासिक संदर्भों की गहराई के लिए पूर्व ज्ञान की जरूरत पड़ती है.
‘ठाकुरबाड़ी’ केवल टैगोर की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय मध्यम वर्ग के उदय की गाथा है. यह बताती है कि कैसे एक परिवार ने साहित्य, संगीत, फैशन और भोजन को आकार दिया. अनिमेष ने भ्रांतियों को दूर किया. जैसे टैगोर को केवल कवि मानने की बजाय, उनके परिवार को एक जीवंत इकाई के रूप में पेश किया. अगर आप इतिहास पसंद करते हैं, तो यह किताब आपको बांध लेगी. कमियां? शायद कुछ चित्र या संदर्भ ग्रंथों का अभाव. लेकिन कुल मिलाकर, यह एक मास्टरपीस है. पाठकों से अपील है इसे पढ़ें, तोहफा दें. टैगोर की विरासत को नया जीवन मिलेगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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