केंद्र में एकजुटता और राज्यों में टकराव—भारतीय राजनीति में इंडिया गठबंधन की मौजूदा स्थिति को शायद इससे बेहतर शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. संसद के भीतर यह गठबंधन भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एक साझा रणनीति के साथ खड़ा नजर आता है, लेकिन जैसे ही चुनावी राजनीति राज्यों में उतरती है, सहयोगी दलों के बीच अंतर्विरोध खुलकर सामने आने लगते हैं.
राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों के लिए एकजुट रहना राजनीतिक जरूरत है. लेकिन राज्यों में वही दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी बन जाते हैं. इसका सबसे बड़ा कारण है क्षेत्रीय राजनीति का दबाव, जहां हर दल अपने जनाधार और नेतृत्व को बचाने की कोशिश करता है.
पश्चिम बंगाल में 294 सीटों पर हो रहे विधानसभा चुनाव इस टकराव की सबसे स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं. यहां भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और वाम मोर्चा—तीनों अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं. राजनीतिक दिलचस्पी इस बात से और बढ़ जाती है कि तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव और हेमंत सोरेन जैसे नेता ममता बनर्जी के समर्थन में खड़े दिखाई देते हैं, जबकि कांग्रेस भी उसी गठबंधन का हिस्सा है.
केरल में भी तस्वीर अलग नहीं है. यहां तेजस्वी यादव, लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के लिए प्रचार कर रहे हैं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के खिलाफ वोट मांग रहे हैं. विडंबना यह है कि हाल ही में बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था.
असम में झारखंड मुक्ति मोर्चा कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ रही है, जबकि झारखंड में दोनों साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं. कांग्रेस नेताओं जितेंद्र सिंह और गौरव गोगोई ने हेमंत सोरेन से समर्थन मांगा, लेकिन जमीनी स्तर पर तालमेल बन नहीं पाया.
दिल्ली में समाजवादी पार्टी ने आम आदमी पार्टी का समर्थन किया, जबकि उत्तर प्रदेश में वही पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात करती है.
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे कुछ स्पष्ट कारण हैं
इंडिया गठबंधन फिलहाल “रणनीतिक एकता” और “व्यावहारिक प्रतिस्पर्धा” के बीच फंसा हुआ है. यह एक ऐसा गठबंधन है जो विचारधारा से ज्यादा परिस्थितियों पर टिका हुआ दिख रहा है. अगर यह गठबंधन भविष्य में एक मजबूत राष्ट्रीय विकल्प बनना चाहता है, तो उसे राज्य और केंद्र की राजनीति के बीच संतुलन बनाने का स्पष्ट मॉडल तैयार करना होगा. वरना “केंद्र में साथ, राज्यों में टकराव” की यह स्थिति उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन सकती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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