बहुचर्चित ‘कैश कांड’ के घेरे में आए इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा की कानूनी मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं. जस्टिस वर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर एक नई और महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई करने से चीफ जस्टिस शील नागू ने खुद को आधिकारिक तौर पर अलग (Recuse) कर लिया है. जस्टिस शील नागू के अलग होने के बाद अब इस पूरे संवेदनशील मामले की फाइल को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास भेज दिया गया है. मुख्य न्यायाधीश अब यह तय करेंगे कि इस मामले पर सुनवाई के लिए कौन सी नई विशेष पीठ (बेंच) का गठन किया जाएगा.
यह नई जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय की ओर से संविधान के अनुच्छेद 32 (Article 32) के तहत सीधे शीर्ष अदालत में दायर की गई है. दायर याचिका में सुप्रीम कोर्ट से यह सख्त निर्देश देने की मांग की गई है कि इस मामले में बिना किसी देरी के तुरंत आपराधिक एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए. इसके साथ ही, याचिका में पूरे प्रकरण की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट की प्रत्यक्ष निगरानी में एक स्वतंत्र विशेष जांच दल (SIT) का गठन कर गहन जांच कराने की गुहार लगाई गई है.
दायर याचिका के अनुसार, बीते 14 मार्च 2025 को दिल्ली स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक सरकारी आवास पर संदिग्ध परिस्थितियों में भीषण आग लग गई थी. आग बुझाने के दौरान वहां से भारी मात्रा में जली हुई और आधी जली हुई भारतीय मुद्रा (नकदी) मिलने की खबरें मीडिया और पुलिस रिपोर्टों में सामने आई थीं.
इस घटना के सार्वजनिक होने के बाद सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने मामले की आंतरिक जांच के लिए एक तीन सदस्यीय ‘इन-हाउस कमेटी’ (In-house Committee) का गठन किया था, जिसमें जस्टिस शील नागू भी एक सदस्य के रूप में शामिल थे. यही मुख्य वजह है कि जस्टिस शील नागू ने नैतिक आधार पर इस नई याचिका की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया.
याचिकाकर्ता का स्पष्ट तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जांच केवल एक प्रशासनिक या अनुशासनात्मक प्रक्रिया (Disciplinary Procedure) हो सकती है, लेकिन वह किसी भी स्थिति में पूर्ण आपराधिक जांच (Criminal Investigation) का विकल्प या विकल्प स्थानापन्न नहीं हो सकती.
याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्होंने 2 जून 2026 को केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI), दिल्ली पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को लिखित शिकायतें देकर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act), मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम कानून (PMLA), भारतीय न्याय संहिता (BNS) और अन्य संबंधित धाराओं में एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी. हालांकि, जांच एजेंसियों द्वारा एफआईआर दर्ज न किए जाने के बाद मजबूरी में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा है.
जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली आवास से भारी मात्रा में अधजली नोट बरामद होने के बाद 14 मार्च 2025 से ही उनके खिलाफ संवैधानिक महाभियोग (Impeachment) की कार्यवाही के बादल मंडराने लगे थे. जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग का औपचारिक प्रस्ताव 21 जुलाई को लाया गया था. उसी दिन राज्यसभा के चेयरमैन (उपराष्ट्रपति) ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.
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इसके बाद 11 अगस्त को राज्यसभा के डिप्टी चेयरमैन ने इस प्रस्ताव को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया था. हालांकि, अगले ही दिन 12 अगस्त को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 146 सांसदों के हस्ताक्षरों वाले महाभियोग प्रस्ताव को आधिकारिक मंजूरी दे दी. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को सांसदों से मिले ज्ञापन के आधार पर मामले की गहराई से जांच के लिए 3 सदस्यीय जांच समिति का गठन कर दिया था.
इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए जस्टिस यशवंत वर्मा का मुख्य रूप से यह पक्ष रहा है कि उनके इस मामले में ‘न्यायाधीश जांच अधिनियम 1968’ (Judges Inquiry Act, 1968) में तय और निर्धारित वैधानिक प्रक्रियाओं का सही तरीके से पालन नहीं किया गया है. अब सभी की निगाहें सीजेआई द्वारा गठित की जाने वाली नई बेंच पर टिकी हैं.
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