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मध्य प्रदेश के पूर्व कांग्रेस विधायक राजेंद्र भारती को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ा झटका, 25 साल पुराने FD घोटाले में सजा पर रोक से इनकार

कॉपरेटिव बैंक घोटाला मामले में दोषी मध्य प्रदेश के दतिया से कांग्रेस के पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को दिल्ली हाई कोर्ट से झटका लगा है. कोर्ट ने राजेंद्र भारती की दोषसिद्धि पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है. जस्टिस मनोज जैन की सिंगल बेंच ने यह फैसला सुनाया है. कोर्ट ने राजेंद्र भारती की ओर से दायर अपील को खारिज कर दिया है. 9 जुलाई को दिल्ली हाई कोर्ट ने सभी पक्षों की जिरह के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था.

राजेंद्र भारती ने ग्रामीण विकास बैंक धोखाधड़ी केस में ट्रायल कोर्ट द्वारा मिली सजा और दोषसिद्धि के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में अपील की थी. दायर याचिका में भारती ने सजा पर रोक की मांग की थी. राऊज एवेन्यु कोर्ट ने राजेंद्र भारती और बैंक के कर्मचारी कर्मचारी रघुवीर शरण प्रजापति को राऊज एवेन्यु कोर्ट ने तीन साल की सजा सुनाई है. साथ ही कोर्ट ने दोनों को 50 हजार रुपए के निजी मुचलके पर जमानत दे दिया था.

कोर्ट ने दोनों को निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने के लिए 30 दिन का समय दिया था. कोर्ट ने फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) घोटाला मामले में राजेंद्र भारती को भारतीय दंड संहिता की धारा 120B, 420, 467, 468 और 471 के तहत दोषी करार दिया था. 25 साल पुराने घोटाले मामले में यह सजा सुनाई है. विधायक राजेंद्र भारती ने अपनी मां के नाम बैंक में 10.50 लाख रुपए की एफडी तीन साल के लिए कराई थी, जिस पर 13.50 फीसदी ब्याज मिल रहा था. आरोप है कि बाद में एफडी की अवधि तीन साल से बढ़ाकर 15 साल कर दी गई. इसी बैंक के कर्मचारी नरेंद्र सिंह ने कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई थी.

बैंक दस्तावेजों में हेराफेरी कर एफडी की अवधि बढ़ाने का आरोप

कोर्ट ने दर्ज शिकायत को गंभीरता से लेते हुए इसे धोखाधड़ी का मामला माना और केस दर्ज करने के आदेश दिए. जिस समय यह धोखाधड़ी का मामला सामने आया था उस समय राजेंद्र भारती बैंक के संचालक मंडल के अध्यक्ष थे. अभियोजन पकड़ के मुताबिक राजेंद्र भारती ने अपनी पदीय स्थिति और अधिकारों का दुरूपयोग करते हुए बैंक कर्मचारी रघुवीर शरण प्रजापति के साथ मिलकर बैंक दस्तवेज़ों लेजर बुक, एफडी स्लिप और रसीद में काट-छांट कर एफडी की अवधि 3 साल से बढ़ाकर 10 और फिर 15 वर्ष कर दी. इसका उद्देश्य 13.50 फीसदी ब्याज दर का लाभ लंबे समय तक अपनी मां और संबंधित संस्था को दिलाना था.

जांच में सामने आया कि इस हेराफेरी के जरिए वर्ष 1999 से 2011 तक प्रतिवर्ष लगभग 1.35 लाख रुपए का अनुचित लाभ लिया गया, जिससे बैंक को आर्थिक नुकसान हुआ.

ये भी पढ़ें: हिंडवेयर ट्रेडमार्क विवाद मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने गूगल की अपील पर जारी किया नोटिस, 24 जुलाई को अगली सुनवाई

-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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