सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ (Supreme Court Constitution Bench) ने उच्च न्यायिक सेवा संवर्ग में वरिष्ठता के लिए समान और राष्ट्रव्यापी मानदंड तय करने को लेकर बड़ा फैसला दिया है. सीजेआई बी. आर गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने इसको लेकर दिशा निर्देश जारी किया है.
संविधान पीठ ने कहा वरिष्ठता पर नया चार प्वॉइंटर लागू होगा. संविधान पीठ ने कहा है कि अब अधिकारियों की सीनियरिटी एक चार बिंदु रोस्टर प्रणाली से तय होगा और यह सभी राज्यों के लिए बाध्य होगा. कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट कर दिया है कि जारी नई दिशा निर्देश पहले से नियुक्त अधिकारियों की इंटर-सी सीनियरिटी में हस्तक्षेप नहीं करेगी.
सीजेआई गवई ने कहा कि रेगुलर प्रमोटी अधिकारियों की नाराजगी एक अलग वर्ग बनाने का आधार नहीं हो सकती. कोर्ट ने कहा कि सिविल जज के रूप में लंबे समय तक सेवा अलग वर्ग बनाने का वैध आधार नहीं है. कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठता के लिए मेरिट कम सीनियरिटी ही आधार होगा. सीजेआई ने कहा कि व्यक्तिगत तरक्की की चाह सेवा संरचना को निर्धारित नही कर सकती. यह सेवा का स्वाभाविक हिस्सा है. कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी साफ कर दिया है कि भविष्य में बदलाव किया जा सकता है.
सीजेआई गवई ने कहा कि जज आसान काम नहीं करते, वे वही निर्णय लेते हैं जिनसे अन्य लोग बचते हैं. उन्होंने कहा कि हमारे दिशानिदेश सामान्य और अनिवार्य हैं. संविधान पीठ ने इस स्थिति पर गौर किया था कि अधिकांश राज्यों में, दीवानी न्यायाधीश (सीजे) के रूप में भर्ती होने वाले न्यायिक अधिकारी अक्सर प्रधान जिला न्यायाधीश (पीडीजे) के स्तर तक भी नहीं पहुंच पाते. हाई कोर्ट के न्यायाधीश के पद तक पहुचना तो दूर की बात है. इसके बावजूद कई प्रतिभाशाली युवा अधिवक्ता सीजे के स्तर की सेवा में शामिल होने के लिए हतोत्साहित हो रहे हैं.
सुनवाई में इलाहाबाद हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के बीच तकरार देखने को मिल चुका है. न्यायिक अधिकारियों की सेवा नियम के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने सुप्रीम कोर्ट से साफ शब्दों में कहा था कि वह इस मुद्दे पर कोई हस्तक्षेप न करें.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि जिला न्यायपालिका पर अनुच्छेद 227 (1) के तहत निगरानी का अधिकार हाई कोर्ट के पास है, इसलिए सेवा नियमों का ढांचा तैयार करने का काम भी हाई कोर्ट को नहीं करना चाहिए.
इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा था हाईकोर्ट्स को संविधान के तहत उनके अधिकार और कर्तव्यों से वंचित किया जाना चाहिए? अब समय आ गया है कि हाईकोर्ट्स को मजबूत किया जाए, न कि उन्हें कमजोर किया जाए. बात बहुत आगे बढ़ चुकी है. उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट को जिला न्यायाधीशों की भर्ती, सेवानिवृति आयु या प्रमोशन कोटा जैसा मामलों में दखल नहीं देना चाहिए.
इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि 2017 में, सुप्रीम कोर्ट ने सैद्धांतिक रूप से एक अवधारणा पत्र को अंतिम रूप दिया था, जिसमें वकालत की गई थी कि सुप्रीम कोर्ट को वकीलों में से सीधे नियुक्त जिला न्यायाधीशों के लिए भर्ती परीक्षा आयोजित करना चाहिए.
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-भारत एक्सप्रेस
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