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भड़काऊ भाषण को लेकर दायर सभी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज

Hate Speech Petition Dismissed: सुप्रीम कोर्ट ने वकील अश्विनी उपाध्याय सहित अन्य द्वारा दायर भड़काऊ भाषण संबंधी याचिकाओं को यह कहते हुए निपटा दिया कि यह मामला विधायी अधिकार क्षेत्र (Legislative Jurisdiction) के अंतर्गत आता है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर छोटी घटना के लिए सुप्रीम कोर्ट निगरानी नहीं कर सकता, क्योंकि इसके लिए पुलिस प्रशासन और संबंधित हाई कोर्ट पहले से मौजूद हैं.

हालांकि, पीठ ने यह भी दोहराया कि पुलिस को भड़काऊ भाषण के मामलों में किसी औपचारिक शिकायत का इंतजार किए बिना स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर कार्रवाई करनी चाहिए, चाहे आरोपी किसी भी धर्म या राजनीतिक दल का क्यों न हो. इस फैसले की कॉपी को सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार के पास भेजने का निर्देश दिया गया है.

भड़काऊ भाषण वाली याचिकाएं खारिज

भड़काऊ भाषण को लेकर दायर सभी याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया. कोर्ट ने कहा मौजूदा कानून पर्याप्त है. अगर किसी को कोई दिक्कत है तो वह संबंधित हाई कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है. कोर्ट ने फैसले की कॉपी को हर हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार के समक्ष भेजने को कहा है. जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह फैसला दिया है.

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय सहित अन्य की ओर से दायर की गई थी. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह मामले में विधायी अधिकार क्षेत्र में आता है. कोर्ट ने कहा संवैधानिक कोर्ट कानून की व्याख्या कर सकता है. लेकिन वे कानून बनाने के लिए बाध्य नहीं कर सकते.

याचिका की आड़ में कानून नहीं बना सकते

कानून बनाने का अधिकार विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है. कोर्ट ने 20 जनवरी को कहा था कि वह 2021 से लंबित नफरती भाषणों से संबंधित अधिकांश याचिकाओं का निपटारा कर देना. जिनमें अदालत ने पुलिस को स्वतः संज्ञान लेते हुए प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया था. मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रमनाथ ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा था कि हम याचिका की आड़ में कानून नहीं बना सकते.

भड़काऊ भाषण मामले में पुलिस को संज्ञान लेना चाहिए

उन्होंने कहा था कि हम इस देश के किसी भी इलाकों में होने वाली हर छोटी घटना पर कानून बनाने या उसे निगरानी करने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि इससे निपटने के लिए कानून, थाने और हाई कोर्ट पहले से ही कानूनी उपाय मौजूद हैं. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वह अपने यहां होने वाले भड़काऊ भाषण की घटना पर खुद संज्ञान लेकर कार्रवाई करें.

पुलिस इसके लिए औपचारिक शिकायत दर्ज होने का इंतजार न करें. कोर्ट ने कहा था कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आरोपी किस राजनीतिक दल से संबंध रखता है, या किस धर्म से भड़काऊ भाषण के मामले में पुलिस को खुद संज्ञान लेना चाहिए.

यह भी पढ़ें:काशी में लगी ‘महाकाल’ की वैदिक घड़ी, पीएम मोदी ने किया अवलोकन; क्या है खासियत?

-भारत एक्सप्रेस

गोपाल कृष्ण

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