लीगल

सुप्रीम कोर्ट की गुजरात सरकार को कड़ी फटकार: 19 साल से गायब केस रिकॉर्ड पर पूछा- दोषी पुलिसकर्मियों पर क्या एक्शन हुआ?

देश भर की अदालतें लंबित मुकदमों के बोझ तले दबी पड़ी हैं. वहीं सुप्रीम कोर्ट इस बात को लेकर चिंतित है कि 19 साल से गायब केस रिकॉर्ड के मामले में फैसला कैसे दे. यह मामला 19 साल से चल रहा था. सुप्रीम कोर्ट ने अब तक गुजरात में लगभग 19 साल से लंबित इस मामले की जांच के दौरान केस रिकॉर्ड गायब होने पर चिंता व्यक्त की है. कोर्ट ने कहा कि ऐसी घटनाएं आपराधिक न्याय प्रणाली की जड़ों पर प्रहार करती हैं और वास्तविक शिकायतों को निष्प्रभावी बना देती हैं. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह चिंता व्यक्त की है.

पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल

अदालत ने गुजरात सरकार से यह बताने को कहा है कि रिकॉर्ड खोने के बाद जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई की गई है. साथ ही लंबित जांच को छह सप्ताह में पूरा कर न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया है. कोर्ट 14 जुलाई को मामले में अगली सुनवाई करेगा. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि लगभग दो दशक बीत जाने के बावजूद जांच किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँची है. कोर्ट ने गुजरात पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाया है. कोर्ट ने कहा कि यदि गवाह नहीं मिल रहे थे या रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था तो पुलिस को उचित क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करनी चाहिए थी, न कि मामले को अनिश्चित काल के लिए लंबित रखना चाहिए था.

अदालतें मूक दर्शक नहीं बनी रह सकतीं

कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए कहा कि संवैधानिक अदालतें ऐसी असाधारण देरी के मामलों में “मूक दर्शक” नहीं बनी रह सकतीं. कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट को भी मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए था. यह मामला 2007 में गुजरात के भीलोड़ा गांव में संपत्ति विवाद से जुड़ी कथित जालसाजी का है. शिकायतकर्ता का आरोप था कि उसकी हज यात्रा के दौरान दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा कर राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदल दिए गए. मामले में धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसी धाराएं लगाई गई थीं.

ये भी पढ़ें: हैम्पटन स्काई रियल्टी केस में ED की बड़ी कार्रवाई; पंजाब, यूपी और दिल्ली-एनसीआर के 6 ठिकानों पर एक साथ छापा

दस्तावेज गुम होने की दलील खारिज

भीलोड़ा के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष चार व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 120बी (आपराधिक षड्यंत्र), 406 (अमानत में खयानत/आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी) और 463 (जाली दस्तावेज बनाना) के तहत शिकायत दर्ज कराई गई थी. मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने बताया कि केस के मूल दस्तावेज और जांच रिपोर्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजते समय गुम हो गए थे, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया.

गोपाल कृष्ण

Recent Posts

भगवा जागरण: उत्तर प्रदेश मंडल की राजनीति से कमंडल के दबदबे तक कैसे पहुंचा

Saffron Politics In UP: उत्तर प्रदेश तब बदला, जब जाति आधारित राजनीति सत्ता की एकमात्र…

2 minutes ago

बीजेपी की नई टीम का चरणबद्ध बदलाव, पुराने दिग्गजों की हुई दमदार वापसी

BJP New National Team: बीजेपी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों में हाल में किए गए फेरबदल को…

16 minutes ago

आखिर क्यों हादसों का हाईवे माना जाता है यमुना एक्सप्रसवे?

यमुना एक्सप्रेसवे पर हादसों का सिलसिला थम नहीं रहा है. ग्रेटर नोएडा में बस आग…

35 minutes ago

क्या है बीजेपी की नई यूपी रणनीति? लखनऊ से लेकर बूथ तक ऐसे बिछ रहा है चुनावी जाल

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने लखनऊ में अपनी संगठनात्मक तैयारियां…

39 minutes ago

दागी नेताओं पर आजीवन चुनाव बैन की मांग, सुप्रीम कोर्ट में जल्द होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट दागी जनप्रतिनिधियों पर आजीवन चुनाव बैन और लंबित आपराधिक केसों के जल्द निपटारे…

39 minutes ago