देश भर के बार निकायों में यौन उत्पीड़न निवारण कानून 2013 के समान कार्यान्वयन की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने यह नोटिस जारी किया है. यह याचिका अधिवक्ता सीमा जोशी ने दायर की है, जो Breaking the Silence: A Handbook on the POSH Act की लेखिका और राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) की आंतरिक समिति की सदस्य भी हैं.
दायर याचिका में मांग की गई है कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया को यौन रोकथाम (POSH) कानून के तहत आंतरिक शिकायत समितियां स्थापित करने का निर्देश देने की मांग की गई है. पॉश अधिनियम को केवल कर्मचारियों तक सीमित मानने वाली व्याख्या गलत है और यह महिला वकीलों को संरक्षण से वंचित करती है. साथ ही यह भी कहा गया है कि अंतरिम राहत के तौर पर हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाई जाए और महिला वकीलों की शिकायतों पर समितियों द्वारा सुनवाई जारी रहे.
याचिका में कहा गया है कि यौन उत्पीड़न महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, जिनमें अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 15 (समानता के अधिकार), अनुच्छेद 19 (1)(g) (किसी भी पेशे का अभ्यास करने की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) शामिल है. दायर याचिका में यह भी मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्ति का प्रयोग कर यह सुनिश्चित करे कि महिला अधिवक्ताओं को भी पॉश अधिनियम का पूरा संरक्षण मिले.
बता दें कि यह याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर की गई है जिसमें हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि पॉश अधिनियम बार काउंसिल और बार एसोसिएशन के केवल कर्मचारियों पर लागू होगा, महिला वकीलों पर नहीं.
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