तीनों आपराधिक कानूनों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि तीनों आपराधिक कानूनों के खिलाफ दायर याचिकाओं पर जल्द सुनवाई कर फैसला दें.
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल मनुभाई पंचोली की बेंच ने तमिलनाडु व पुडुचेरी फेडरेशन ऑफ बार एसोसिएशनों की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है.
दायर याचिका में मद्रास हाईकोर्ट में लंबित मामलों को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित करने की मांग की गई थी. तीनों नए कानूनों के खिलाफ डीएमके के हाई कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है. जिसमें कानूनों को असंवैधानिक और अधिकारहीन घोषित करने की मांग की गई है.
धाराओं में फेरबदल करना आवश्यक
याचिका में कहा गया है कि किसी भी ठोस बदलाव के धाराओं में फेरबदल करना आवश्यक है और इससे प्रावधानों की व्याख्या में काफी असुविधा और भ्रम पैदा होगा. इससे पुलिस को भी त्वरित कार्रवाई में मदद मिलेगी. नए कानून में जीरो एफआईआर की शुरुआत की गई है. पीड़ित किसी भी थाने क्षेत्र में अपनी एफआईआर दर्ज करा सकता है. पीड़ित को एफआईआर की निःशुल्क कॉपी भी मिलेगी.
सशक्त जांच के लिए गंभीर आपराधिक मामलों में सबूत जुटाने के लिए क्राइम सीन पर फॉरेंसिक विशेषज्ञों का जाना अनिवार्य. सबूत एकत्र करने की प्रक्रिया की वीडियोग्राफी अनिवार्य होगी. महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध में जांच एजेंसियों को दो महीने के अंदर जांच पूरी करनी होगी. 90 दिनों के अंदर पीड़ितों को केस में प्रगति की नियमित अपडेट देनी होगी.
चुनौती भरी परिस्थितियों में पीड़ित जाकर हो सकेंगे ठीक
अपराध के शिकार महिला और बच्चों को सभी अस्पतालों में फर्स्ट एड या ईलाज निःशुल्क मिलने की गारंटी होगी. चुनौती भरी परिस्थितियों में भी पीड़ित जाकर ठीक हो सकेंगे. गवाहों की सुरक्षा व सहयोग के लिए सभी राज्य सरकारें विटनेस प्रोटेक्शन प्रोग्राम लागू करेंगी. दुष्कर्म पीड़िताओं को ऑडियो-वीडियो माध्यम से पुलिस के समक्ष बयान दर्ज करने की छूट मिलेगी.
नए कानून में मामूली अपराधों के लिए दंडस्वरूप सामुदायिक सेवा विधा शुरू. समाज के लिए सकारात्मक योगदान देकर दोषी अपनी गलतियों को सुधारने का काम करेगा. सुनवाई में देरी से बचने और न्याय की त्वरित बहाली के लिए कोई अदालत किसी मामले को अधिकतम दो बार ही स्थगित कर सकेगी.
इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से हो सकेगी कानूनी कार्यवाही
सभी कानूनी कार्यवाही इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से हो सकेगी. पीड़ित महिला की अदालती सुनवाई महिला मजिस्ट्रेट ही करेगी. अन्यथा संवेदनशील मामले में किसी महिला की उपस्थिति में पुरुष मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान दर्ज होगा. नए कानून में जुड़ा एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि गिरफ्तारी की सूरत में व्यक्ति को अपनी पसंद के किसी व्यक्ति को अपनी स्थिति के बारे में सूचित करने का अधिकार दिया गया है.
इससे गिरफ्तार व्यक्ति को तुरंत सहयोग मिल सकेगा. महिलाओं 15 साल से कम उम्र के लोगों 60 वर्ष की आयु से अधिक के लोगों और दिव्यांग या गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों को पुलिस थाने आने से छूट दी जाएगी और वे अपने निवास स्थान पर ही पुलिस सहायता प्राप्त कर सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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