देश के मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित मामले में दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण की दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि यह बहुमत की तानाशाही है. सत्ता में आने के बाद हर राजनीतिक दल अपना रुख बदल लेता है. यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. कोर्ट 14 मई को मामले में अगली सुनवाई करेगा.
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि काश जजों की नियुक्ति भी चुनाव आयुक्तों की तरह जल्द होती. वही सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने कहा कि विपक्ष के नेता से प्रभावी परामर्श किए बिना ही चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति जल्दबाजी में की गई.
हंसारिया ने दावा किया कि अदालत में अर्जी की सुनवाई से पहले ही केंद्र सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए जल्दबाजी में कदम उठाए. हंसारिया ने कहा कि 13 मार्च 2024 को विपक्ष के नेता को 200 चयनित नामों की सूची दी गई थी. अगले दिन चयन समिति की बैठक हुई और ज्ञानेश कुमार और सुखबीर संधू के नाम चुने गए. हंसारिया ने आगे कहा कि जब आप एक व्यक्ति को पूर्ण शक्ति दे देते हैं तो यही होता है. विपक्ष में नेता से एक दिन में इतने सारे नामों की जांच करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? इसपर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हम केवल यही कह सकते हैं कि हम जजों की नियुक्ति में विशेष रूप से हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति में ऐसी ही तत्परता की कामना करते हैं.
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश प्रशांत भूषण ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर रखने वाले नए कानून का विरोध किया है. भूषण ने कहा कि जब लालकृष्ण आडवाणी विपक्ष में थे, तब उन्होंने भी नियुक्ति प्रक्रिया पर कार्यपालिका के पूर्ण नियंत्रण पर सवाल उठाए थे. इसपर जस्टिस दीपांकर दत्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह चुने हुए लोगों की तानाशाही जैसा है. जो भी सत्ता में आता है, वही काम करता है. यह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है. वही जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने भी कह रहे यह बहुमत का तानाशाही है. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने भूषण से पूछा कि सुप्रीम कोर्ट से पहले संसद ने इस विषय पर कानून क्यों नही बनाया? इसपर भूषण ने कहा कि सभी सरकारों ने इसका फायदा उठाया, इसलिए सुधार नही किए.
सुनवाई के दौरान जस्टिस दत्ता ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर पर बनीडाक्यूमेंट्री का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि संविधान लागू होने के कुछ साल बाद ही डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि देश में लोकतंत्र सही तरीके से काम नही कर रहा है. पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि कोर्ट संसद को कानून बनाने का निर्देश नही दे सकता. उन्होंने कहा क्या 300 से अधिक पन्नों में की गई टिप्पणियां केवल उस व्यवस्था को सही ठहराने के लिए नही थी, जिसे अदालत ने कानून बनाने तक अस्थायी रूप से लागू किया था? क्या आप कह सकते हैं कि बनने वाला कानून भी इन्ही टिप्पणियों का पालन करें. उन्होंने कहा कि जब अदालत ने यह कह दिया कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त का चयन केवल कार्यपालिका द्वारा नही होना चाहिए, तो वह वहीं क्यों रुक गई? अदालत ने मानक तय किए, फिर उन्हें सिर्फ कानून बनने की एक निश्चित अवधि तक ही क्यों सीमित किया?
इस फैसले को साधारण रूप से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि यह केवल उस स्थिति से निपटने के लिए था, जहां कोई कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं थी. यह याचिका कांग्रेस नेता डॉक्टर जया ठाकुर सहित अन्य की ओर से दायर की गई है. दायर याचिका में केंद्र सरकार के2023 के उस कानून को चुनौती दी है, जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया गया है. नए कानून के मुताबिक इस चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होंगे.
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-भारत एक्सप्रेस
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