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सबरीमाला पुनर्विचार: धर्म और न्याय के टकराव पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- ‘सुधार के नाम पर धर्म को खोखला नहीं कर सकते’

Sabarimala Case: सीजेआई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ ने धार्मिक प्रथाओं और मौलिक अधिकारों में अदालती दखल की सीमाओं पर चर्चा की.

SUPREME COURT
Edited by Shubhra Rai

Supreme Court of India: जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस सुंदरेश ने चिंता जताई कि हर धार्मिक प्रथा में हस्तक्षेप से धर्म का ढांचा टूट सकता है. वकील राजू रामचंद्रन ने दलील दी कि यदि कोई प्रथा संविधान के खिलाफ है, तो कोर्ट को हस्तक्षेप करना ही चाहिए. सुनवाई में पारसी महिलाओं के मंदिर प्रवेश का उदाहरण देते हुए इसे लैंगिक भेदभाव और अधिकारों के हनन का मामला बताया गया.

सीजेआई सूर्यकांत की पीठ धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25-26) और व्यक्तिगत मौलिक अधिकारों के टकराव पर सुनवाई कर रही है.

9 जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले में दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की. मामले में सीजेआई की अध्यक्षता वाली 9 जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है.

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने कहा कि इस शक्ति का मनमाने ढंग से इस्तेमाल किया गया है, जिससे समुदाय के सदस्यों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है.

स्वीकार नहीं किया जा सकता

जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि भारत एक ऐसी सभ्यता है, जहां धर्म समाज से गहराई से जुड़ा हुआ है. उन्होंने कहा कि यदि हर धार्मिक प्रथा को अदालत में चुनौती दी जाने लगे, तो यह सभ्यता किस दिशा में जाएगी. यह चिंता का विषय है. वही जस्टिस एमएम सुंदरेश ने भी कहा कि अगर अदालतें हर धार्मिक विवाद में हस्तक्षेप करेगी तो धर्म टूट जाएंगे.

इसपर रामचंद्रन ने कहा कि भारत एक संविधान द्वारा संचालित सभ्यता है और जो भी प्रथा संविधान के मूल्यों के खिलाफ होगी, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.

लैंगिक भेदभाव और बहिष्कार का मामला

उन्होंने कहा कि अदालतों को यह दायित्व है कि वे मौलिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में हस्तक्षेप करें. पिछली सुनवाई में संविधान पीठ ने मौखिक रूप से कहा था कि यदि किसी पारसी महिला को केवल इसलिए अगियारी यानी फायर टेंपल में प्रवेश को रोका जाता है, क्योंकि उसने अपने धर्म से बाहर विवाह किया है, तो यह लैंगिक भेदभाव और बहिष्कार का मामला लगता है.

जस्टिस बीवी नागरत्ना ने यह टिप्पणी की थी. जस्टिस नागरत्ना ने पूछा था कि क्या किसी महिला के दूसरे धर्म में विवाह करने पर प्रतिबंध है? क्या यह धर्म का मामला है? इसपर याचिकाकर्ता के वकील ने कहा था कि नहीं, यहां तक कि हाई कोर्ट ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि धर्म में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.

धर्म से निष्कासित करने का कोई प्रावधान नहीं

अंतरजातीय विवाह के बाद किसी पारसी महिला को धर्म से बहिष्कृत करने का कोई प्रावधान नहीं है. दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय विवाह को धर्म की दृष्टि से अनुचित माना जाता है. लेकिन उन्हें धर्म से निष्कासित करने का कोई प्रावधान नहीं है. जस्टिस नागरत्ना ने कहा था कि यदि यह धर्म का मामला नहीं है, तो दीवानी मुकदमा दायर करें.

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा था कि यदि अनुच्छेद 25 (1) और 26 में विरोधाभास है, तो प्रश्न यह है कि कोई विरोधाभास नहीं है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.

पारसी लड़ाई खत्म होने दें

सीजेआई ने कहा कि कम से कम मैं खुद इस बात से सहमत नहीं हूं कि यहां सामंजस्य स्थापित करने की कोई आवश्यकता है. वरिष्ठ वकील राजू रामचन्द्र ने कहा था कि जवाहरलाल नेहरू के एक चचेरे भाई थे, बी के नेहरू, वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध राजनयिक थे. उनकी आत्मकथा का शीर्षक था, अच्छे लोग दूसरे स्थान से आते हैं.

मेरी बस यही गुजारिश है कि यह बदमिजाज व्यक्ति तीसरे स्थान पर आए, चौथे या पांचवे स्थान पर नहीं. बस इतना ही, पहले पारसी लड़ाई खत्म होने दें.

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-भारत एक्सप्रेस 



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