देश मे लंबित मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रहा है. इसका कोई एक कारण नही है, बल्कि अनेक कारण है. किसी व्यक्ति पर अपराध का आरोप लगना और अदालत में उसका दोष साबित होना दोनों अलग-अलग बातें है. कानून की नजर में किसी आरोपी को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक उसके खिलाफ अपराध साबित न हो जाए. लेकिन भारतीय न्याय व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती यह है कि बड़ी संख्या में लोग अपने मुकदमों का अंतिम फैसला आने से पहले ही वर्षो जेल में बिता रहे हैं.
इसको लेकर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरों अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या, जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों की संख्या और जमानत मिलने के बाद रिहाई में समस्या को लेकर आकंड़े जारी करते रहता है. एनसीआरबी द्वारा 2023 में जारी आंकड़ों के मुताबिक 31 दिसंबर 2023 तक देश की जेलों में कुल 5,30,333 कैदी बंद थे. इनमें 3, 89, 910 विचाराधीन कैदी थे. यानी जेलों में बंद कुल कैदियों में लगभग 74 प्रतिशत ऐसे थे, जिनके मामलों में अभी दोषसिद्धि नहीं हुई थी.
दूसरे शब्दों में कहें तो जेल में बंद हर चार कैदियों में करीब तीन विचाराधीन थे. यह आंकड़ा भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था के सामने मौजूद चुनौती को समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण है. हालांकि विचाराधीन कैदी होने का अर्थ यह नहीं है कि सभी आरोपियों के मामले में देरी का कारण अदालत है या सभी आरोपी निर्दोष है. केंद्रीय कानून मंत्रालय की ओर से 13 फरवरी 2026 को लोकसभा में दिए गए उत्तर में उपलब्ध कराए गए एनसीआरबी के 2023 के आंकड़ों के अनुसार देश मे 10, 392 विचाराधीन कैदी पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद थे. वही 23,006 कैदी तीन से पांच साल की अवधि से हिरासत में थे.
लोकसभा में प्रस्तुत राज्यवार आंकड़ों के मुताबिक, पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद विचाराधीन कैदियों की संख्या उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में विशेष रूप से अधिक थी. उत्तर प्रदेश में ऐसे 2,639 कैदी थे, जबकि महाराष्ट्र में 2,213 और पश्चिम बंगाल में 1245 विचाराधीन कैदी पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद थे. इन तीन राज्यों में ही ऐसे कैदियों की कुल संख्या 6,097 थी. अन्य राज्यों की स्थिति भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. दिल्ली में 497, झारखंड में 481, राजस्थान और गुजरात मे 464-464, हरियाणा में 416, ओडिशा में 414 और पंजाब में 183 विचाराधीन कैदी पांच साल से अधिक समय से हिरासत में थे. ये आंकड़े 31 दिसंबर 2023 में स्थिति पर आधारित है और लोकसभा में 13 फरवरी 2026 में दिए गए उत्तर से संबंधित है. लेकिन देश में विचाराधीन कैदियों की समस्या को समझने के लिए देश की अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या पर नजर डालना जरूरी है.
राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के 30 जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के मुताबिक देश की जिला और अधीनस्थ अदालतों में कुल 4,99,11,920 मामले लंबित थे. इनमें 93,97,617 मामले में पांच साल से अधिक पुराने और 54,51,914 मामले दस साल से अधिक पुराने थे. कानून मंत्रालय की ओर से 7 अगस्त 2026 को दिए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जिला और अधीनस्थ न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारियों के 30,825 स्वीकृत पदों के मुकाबले 21411 अधिकारी कार्यरत थे. इस प्रकार 9,414 पद खाली थे. वही जेलों में भीड़भाड़ की समस्या विचाराधीन कैदियों की स्थिति को और कठिन बना सकती है.
एनसीआरबी की 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक देश की जेलों की कुल स्वीकृत क्षमता 4,39,119 कैदियों की थी, जबकि वहां 5,30,333 कैदी बंद है. इसका मतलब जेलों में उनकी निर्धारित क्षमता से 21 फीसदी अधिक कैदी मौजूद थे. कुछ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्थिति इससे भी गंभीर थी. पीआरएस की 2026-27 की गृह मंत्रालय संबंधी बजट समीक्षा में प्रस्तुत 2023 के आंकड़ों के अनुसार दिल्ली की जेलों की अधिभोग दर लगभग 200 प्रतिशत थी. इसका मतलब है कि जहां 100 कैदियों को रखने की क्षमता थी, वहां लगभग 200 कैदी मौजूद थे.
इसी तरह मेघालय में अधिभोग दर 189 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 152 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 150 प्रतिशत थी. जेलों में क्षमता से अधिक कैदियों का असर केवल रहने और सोने की जगह तक सीमित नही रहता. इससे स्वच्छता, स्वास्थ्य सेवाओं, मानसिक स्वास्थ्य, मुलाकात और सुधारात्मक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है. लंबे समय से विचाराधीन कैदियों के लिए ऐसी परिस्थितियों में रहना और भी कठिन हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट के सेंटर फॉर रिसर्च एंड प्लानिंग की नवंबर 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए पीआरएस की 2026-27 की बजट समीक्षा में बताया गया कि दिसंबर 2023 तक 24,879 ऐसे आरोपी जेल में थे, जिन्हें जमानत मिल चुकी थी, लेकिन वे जमानत बांड जमा नही कर पाए थे.
केंद्र सरकार द्वारा फरवरी 2026 में लोकसभा में दिए गए आंकड़े के मुताबिक योजना के तहत जमानत संबंधी सहायता के लिए एक लाख रुपए तक का प्रावधान था. 10 फरवरी 2026 तक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा योजना के तहत 71,71,476 रुपये का उपयोग किया गया था और 273 पात्र कैदियों को लाभ मिला था. कानून मंत्रालय की ओर से 13 फरवरी 2026 को लोकसभा में दिए गए जवाब के मुताबिक वर्ष 2021 से 2025 के बीच इन समितियों की सिफारिश पर कुल 2,75,065 कैदियों को जमानत या रिहाई के लिए अनुशंसित किया गया. इनमें से 1, 35,237 कैदियों को सिफारिशों के बाद रिहा किया गया.
आंकड़ों के अनुसार 2021 में 36,983 विचाराधीन कैदी, 17020 रिहा, वर्ष 2022 में 70, 780 विचाराधीन कैदी 35,480 रिहा, वर्ष 2023 में 73,274 विचाराधीन कैदी, 34,232 रिहा, वर्ष 2024 -53594 विचाराधीन कैदी, 25,982 रिहा और वर्ष 2025-40,434 विचाराधीन कैदी, 22,523 को रिहा किया गया. भारतीय संविधान केअनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण देता है.
न्यायिक प्रक्रिया में अनुचित देरी और बिना दोषसिद्धि के लंबे समय तक हिरासत में रहना इसी संवैधानिक संरक्षण से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल है. इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एएन मित्तल की माने तो मुकदमों के निस्तारण का कई कारण है, जिनमें बढ़ती हुई आबादी, बढ़ती हुई जागरूकता, घटती हुई नैतिकता और घटती हुई ईमानदारी इसका मुख्य कारण है.
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-भारत एक्सप्रेस
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