लाइफस्टाइल

‘9 To 5’ से आगे नहीं! क्यों बदल रही है युवाओं की Work Culture

Effort Recession: कॉर्पोरेट दुनिया में इन दिनों एक नया शब्द चर्चा में है—Effort Recession. इसका सीधा मतलब यह नहीं है कि युवा काम से बचना चाहते हैं. बल्कि यह उस बदलती सोच को दर्शाता है, जिसमें कर्मचारी अपनी नौकरी में तय जिम्मेदारियों से आगे जाकर लगातार अतिरिक्त मेहनत करने को जरूरी नहीं मानते. पहले ऑफिस में देर तक रुकना, छुट्टी के दिन ईमेल का जवाब देना और अतिरिक्त जिम्मेदारियां लेना dedication की निशानी माना जाता था. लेकिन नई पीढ़ी इस सोच पर सवाल उठा रही है. उसका सवाल है—अगर अतिरिक्त मेहनत का अतिरिक्त फायदा नहीं मिलता, तो उसे लगातार क्यों किया जाए?

“Quiet Quitting” से आगे की कहानी

कुछ साल पहले Quiet Quitting शब्द चर्चा में आया था. इसका मतलब था नौकरी छोड़ना नहीं, बल्कि सिर्फ उतना काम करना जितना नौकरी के लिए तय है. Effort Recession इसी बदलाव की अगली कड़ी जैसा दिखाई देता है. इस बदलाव के पीछे महामारी के बाद बदली work culture भी एक कारण है. Remote और hybrid working ने लोगों को यह समझने का मौका दिया कि काम और निजी जिंदगी के बीच बेहतर सीमा बनाई जा सकती है. साथ ही बढ़ती महंगाई, नौकरी की असुरक्षा और burnout ने भी कर्मचारियों को अपने समय और ऊर्जा की कीमत समझाई है.

क्या युवा महत्वाकांक्षी नहीं हैं?

यही सबसे बड़ा भ्रम हो सकता है. हर युवा कम मेहनत नहीं करना चाहता. फर्क सिर्फ इतना है कि अब मेहनत का उद्देश्य बदल रहा है. युवा कर्मचारी ऐसी मेहनत करना चाहते हैं जिसका संबंध skill development, बेहतर salary, career growth या meaningful work से हो.

यानी सवाल “मैं कितना काम कर सकता हूं?” से बदलकर “मैं किस काम के लिए अपनी ऊर्जा खर्च करना चाहता हूं?” हो रहा है.

कंपनियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?

“Effort Recession” कंपनियों के लिए एक चेतावनी भी है. अगर कर्मचारी लगातार extra hours और अतिरिक्त जिम्मेदारियों को स्वीकार नहीं कर रहे, तो organizations को यह समझना होगा कि केवल “dedication” की उम्मीद काफी नहीं है.

बेहतर compensation, स्पष्ट job roles, flexible working और वास्तविक career growth अब employee motivation के महत्वपूर्ण हिस्से बनते जा रहे हैं.

यह भी पढ़ें: पपीते में कील ठोकने से आएंगे ढेरों फल? जानें सच या सिर्फ अफवाह

क्या नई पीढ़ी कामचोर है…

“Effort Recession” को सिर्फ नई पीढ़ी कामचोर हो गई है कहकर खारिज करना आसान है. लेकिन इसके पीछे workplace की एक बड़ी मानसिकता बदल रही है. आज का युवा शायद कम मेहनत नहीं करना चाहता—वह बिना वजह अपनी जिंदगी का ज्यादा हिस्सा नौकरी को देने से इनकार कर रहा है. और शायद आने वाले समय में सवाल यह नहीं होगा कि कर्मचारी कितने घंटे ऑफिस में रहे, बल्कि यह होगा कि उसने दिए गए समय में कितना meaningful काम किया.

भारत एक्सप्रेस

Swati Pandey

Recent Posts

रांची में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का संवाद कार्यक्रम: शिक्षा, सामाजिक समरसता और विकसित भारत पर ज़ोर

प्रो. (डॉ.) शाहिद अख़्तर ने कहा— “शिक्षा से सशक्तिकरण, संवाद से एकता और समरसता से…

1 hour ago

यूपी में बीजेपी का बड़ा संगठनात्मक फेरबदल: एससी मोर्चा के 95 जिला अध्यक्ष घोषित

उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने संगठनात्मक मजबूती के लिए एससी मोर्चा के 95 जिला अध्यक्षों…

3 hours ago

श्री विजयपुरम में नवरात्रि की धूम: उपराज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा पहले ‘डांडिया महोत्सव’ में हुए शामिल, माता दुर्गा के सामने टेका मत्था

अंडमान-निकोबार की राजधानी श्री विजयपुरम के ITF मैदान में प्रथम डांडिया महोत्सव आयोजित हुआ. उपराज्यपाल…

3 hours ago

अंडमान-निकोबार में राज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा ने किया इंडियन ऑयल के बार्ज ‘MT IRIS’ का लोकार्पण

अंडमान-निकोबार के श्री विजयपुरम में उपराज्यपाल डॉ. दिनेश शर्मा ने इंडियन ऑयल के नए बार्ज…

3 hours ago

सऊदी अरब के रियाद एयरपोर्ट पर भीषण हमला, 12 की मौत और 300 से ज्‍यादा घायल; 11 भारतीय भी चपेट में आए

Riyadh Airport Attack: सऊदी अरब के रियाद स्थित किंग खालिद एयरपोर्ट पर भीषण हमला हुआ.…

4 hours ago