मुगलकालीन भारत का इतिहास अक्सर तलवारों की खनक और बादशाहों के विजय अभियानों के शोर में सिमट कर रह जाता है. किंतु उसी दौर में महलों की प्राचीर के भीतर से सत्ता को दिशा देने वाली एक ऐसी प्रज्ञा भी मौजूद थी, जिसे इतिहास के पन्नों में वह स्थान नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी.
सेतु प्रकाशन से प्रकाशित राजीव कुमार का नया उपन्यास ‘जहांआरा: पादशाह बेगम’ उसी विस्मृत कर दी गई शक्ति और संवेदना का जीवंत दस्तावेज है.
ये उपन्यास मुगल बादशाह शाहजहां की सबसे लाड़ली और शक्तिशाली पुत्री जहांआरा बेगम के जीवन संघर्षों को केंद्र में रखकर बुना गया है. जहांआरा केवल एक राजकुमारी नहीं थीं, बल्कि वे ‘पादशाह बेगम’ (प्रथम महिला) की उपाधि से विभूषित, साम्राज्य की सबसे प्रभावशाली महिला थीं. राजीव कुमार ने अपनी लेखनी के माध्यम से जहांआरा के बहुआयामी व्यक्तित्व को पुनर्जीवित किया है.
उपन्यास इस तथ्य को रेखांकित करता है कि जहांआरा मात्र महलों में रहने वाली शहजादी नहीं, बल्कि एक कुशल वास्तुकार भी थीं. दिल्ली के ऐतिहासिक चांदनी चौक का नक्शा उनकी ही कल्पना का प्रतिफल है.
वे एक प्रखर कवयित्री और सूफी मत की अनुयायी थीं. मुल्ला शाह की शिष्या के रूप में उनका आध्यात्मिक सफर और उनकी रचनाएं उनके व्यक्तित्व की गहराई को दर्शाती हैं.
लेखक ने जहांआरा के माध्यम से उस दौर की क्रूर राजनीति और पारिवारिक त्रासदियों का बारीकी से चित्रण किया है. जब मुगल सल्तनत दारा शिकोह और औरंगजेब के बीच उत्तराधिकार के रक्तरंजित युद्ध से गुजर रही थी, तब जहांआरा एक मध्यस्थ और शांतिदूत की भूमिका में खड़ी थीं. ये उपन्यास उनके उस आंतरिक द्वंद्व को स्वर देता है, जहां एक बहन को अपने ही भाइयों के बीच सत्ता की क्रूरता और पिता के प्रति अटूट निष्ठा के बीच तालमेल बिठाना पड़ा.
राजीव कुमार का ये उपन्यास मुग़लकालीन इतिहास को एक नारीवादी नजरिए से देखने का सफल प्रयास है. सामान्यतः मुगल हरम को विलासिता का केंद्र मान लिया जाता है, लेकिन ये कृति उसे एक ‘शक्ति केंद्र’ (Power Center) के रूप में प्रस्तुत करती है. जहांआरा द्वारा संचालित व्यापारिक जहाज ‘साहिबी’ और उनकी राजनीतिक सूझ-बूझ ये प्रमाणित करती है कि वे अपने समय से बहुत आगे की सोच रखने वाली महिला थीं.
‘जहांआरा का जीवन त्याग, विद्वत्ता और राजनीतिक कौशल का एक दुर्लभ संगम है. लेखक ने इतिहास की सूखी तारीखों के पीछे छिपी एक स्त्री की संवेदनाओं को बड़ी शिद्दत से पकड़ा है.’
जहांआरा: ‘पादशाह बेगम’ न केवल इतिहास के छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ है, बल्कि उन सामान्य पाठकों के लिए भी एक आवश्यक कृति है जो इतिहास को राजाओं की कहानियों से परे मानवीय दृष्टिकोण से देखना चाहते हैं. ये उपन्यास जहांआरा के प्रति न्याय करने के साथ-साथ ये भी संदेश देता है कि इतिहास केवल विजेताओं का नहीं, बल्कि मर्यादा और प्रेम के लिए संघर्ष करने वालों का भी होता है.
ये भी पढ़ें:भारतीय इतिहास अध्ययन में एक नई बहस शुरू कर रही है प्राचीन भारत: संस्कृति के पांच अंतर्विरोध
-भारत एक्सप्रेस
इटावा में महज 500 रुपये की रंगदारी न देने पर कार सवार दबंगों ने दो…
दिवाली और छठ पूजा पर घर जाने वाले यात्रियों के लिए रेलवे ने मुंबई और…
PERM Program Suspension: अमेरिका ने PERM प्रोग्राम से इंफोसिस, TCS, विप्रो, HCL, कॉग्निजेंट, माइक्रोसॉफ्ट और…
UP Assembly Election 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारी में बीजेपी और आरएसएस…
India Mobile Congress 2026: इंडिया मोबाइल कांग्रेस 2026 में रिलायंस जियो के चेयरमैन आकाश अंबानी…
रांची के हरमू स्थित जनरल ए.एस. वैद्य चौक का नाम बदलने को लेकर बीजेपी और…