विजय राम, भारत एक्सप्रेस
Ram Navami Vishesh: आज चैत्र नवरात्रि का नौवां दिन है, जिसे रामनवमी कहते हैं. ये वही दिन है, जब परब्रह्म परमेश्वर ने पृथ्वी पर श्रीराम के रूप में मनुष्यावतार धारण किया था. अब से लाखों वर्ष पहले (त्रेतायुग के अंतिम चरण में) चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी को ही श्रीराम का प्राकट्य हुआ था. पौराणिक महाकाव्य ‘वाल्मीकि रामायण‘ में श्रीराम के रूप, स्वभाव और उनके गुणों का विस्तार से वर्णन किया गया है.
महर्षि वाल्मीकि रचित संस्कृत महाकाव्य रामायण के अनुसार, श्रीराम की महिमा को यहां सचित्र समझिए –
भगवान विष्णु त्रेतायुग में चैत्र शुक्ल नवमी पर अयोध्या में राजा दशरथ के यहां पुत्र बनकर राम अवतार के रूप में प्रकट हुए थे. धर्मग्रंथों में बतलाया गया है कि त्रेतायुग 12 लाख 96 हजार मानव-वर्षों का होता है. उस युग में जन्मे राक्षसराज रावण की आयु भी कई लाख वर्ष थी.
रावण और उसके सगे-संबंधियों ने जब संसार में अत्याचारों से त्राहि-त्राहि मचा दी थी, बुराइयां फैल रही थीं, पृथ्वी पर अधर्म बहुत बढ़ गया था. तब पृथ्वी, देवताओं और सप्तऋषियों के निवेदन पर भगवान विष्णु ने स्वयं मनुष्यवतार धारण कर राक्षसों को दंडित करने का निर्णय लिया.
अवतरण का कालचक्र
कलयुग को शुरू हुए 5 हजार से ज्यादा वर्ष बीत चुके हैं, और श्रीराम का अवतार त्रेतायुग के अंतिम चरण में हुआ था. इस कालगणना के हिसाब से श्रीराम का अवतार अयोध्या में लगभग 9 लाख साल पहले (त्रेतायुग में) हुआ था.
श्रीराम के बाल लंबे और चमकदार थे. उनका चेहरा चंद्रमा की तरह सौम्य और कोमल था. उनकी आंखें बड़ी और कमल के फूल जैसी थीं. उनकी नाक सुडोल और ऊंची थी, जो उनके चेहरे के साथ बेहद सुंदर लगती थी.
भगवान राम के होंठों का रंग उगते सूरज जैसा लाल था. उनके कान सामान्य से कुछ बड़े थे, जिनमें सुंदर कुंडल लगे होते थे. उनकी हथेलियों की लंबाई भी सामान्य से थोड़ी ज्यादा थी, जो उनके घुटनों तक पहुंचती थीं, इसलिए उन्हें ‘आजानूभुज’ कहा गया. उनके पेट का आकार शरीर के अनुपात में सामान्य था, और उनके पैरों की लंबाई भी शरीर के अन्य हिस्सों के साथ संतुलित थी.
श्रीराम का स्वभाव अत्यंत शांत और शालीन था. वे कभी भी किसी व्यक्ति के दोषों को नहीं देखते थे. वे हमेशा मीठे वचन बोलते और किसी से कठोर शब्द सुनने के बावजूद प्रतिक्रिया नहीं देते थे. यदि कोई उनके साथ भला करता, तो वे उस व्यक्ति से सदा प्रसन्न रहते थे.
श्रीराम ने कभी किसी का अपमान नहीं किया और न ही किसी के अपराध को याद रखा. उनका चरित्र अत्यंत निर्मल और पवित्र था. वे झूठ नहीं बोलते थे और सभी का आदर करते थे. उनके और उनकी प्रजा के बीच एक विशेष प्रेम और सम्मान का संबंध था. वे दयालु थे, क्रोध को जीतने वाले थे, और दुखी लोगों के प्रति गहरी दया रखते थे.
श्री राम अत्यंत पराक्रमी और बुद्धिमान थे. वे सदैव निरोगी और युवा दिखते थे. उनका वाक्चातुर्य अद्भुत था, और वे समय, स्थिति और परिस्थितियों का गहन ज्ञान रखते थे. वे सभी विद्याओं के ज्ञाता थे, और शस्त्र विद्या में वे अपने पिता से भी श्रेष्ठ थे. उनकी स्मरण शक्ति भी अद्वितीय थी, और वे सभी अस्त्र-शस्त्रों में पारंगत थे.
श्री राम सदा ज्ञान प्राप्ति के लिए समय निकालते थे. वे महात्माओं और विद्वानों से कुछ न कुछ नया सीखने की कोशिश करते रहते थे. उनके जीवन में कभी घमंड का स्थान नहीं था. वे अपनी शक्तियों का कभी आडंबर नहीं करते थे, और हमेशा विनम्र रहते थे.
श्री राम के रूप और स्वभाव में जो गुण थे, वे हमें जीवन में शांति, दया, विनम्रता और साहस का महत्व सिखाते हैं. उनका जीवन हमेशा प्रेरणा देने वाला रहा है. रामनवमी के इस पवित्र अवसर पर हमें श्रीराम के गुणों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेना चाहिए.
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