आस्था

केदारनाथ में 5 महीने में 50.30 टन कचरा, पिछले तीन साल का रिकॉर्ड टूटा

Kedarnath Waste Crisis 2026: उत्तराखंड के प्रसिद्ध तीर्थस्थल केदारनाथ में इस साल तीर्थयात्रियों की बढ़ती आवाजाही के साथ कचरे का संकट भी गंभीर होता नजर आ रहा है. अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच केदारनाथ में 50.30 मीट्रिक टन कचरा दर्ज किया गया. यह मात्रा पिछले तीन वर्षों के पूरे यात्रा सीजन में जमा हुए कचरे से भी अधिक है. बढ़ते कचरे को लेकर पर्यावरण और स्थानीय जल स्रोतों पर संभावित प्रभाव की चिंता बढ़ गई है.

तीन साल के रिकॉर्ड से ज्यादा कचरा

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, केदारनाथ में 2023 के पूरे सीजन में 32.58 मीट्रिक टन, 2024 में 26.10 मीट्रिक टन और 2025 में 21.40 मीट्रिक टन कचरा दर्ज किया गया था. इसके मुकाबले 2026 में सिर्फ पांच महीनों यानी अप्रैल से अगस्त के बीच ही कचरे का आंकड़ा 50.30 मीट्रिक टन पहुंच गया. यानी इस साल का आंकड़ा पिछले तीन वर्षों के वार्षिक आंकड़ों से काफी अधिक है.

कम श्रद्धालु, फिर भी प्रति यात्री बढ़ा कचरा

चिंता की एक और वजह यह है कि इस अवधि में श्रद्धालुओं की संख्या पिछले कुछ वर्षों की तुलना में कम रहने के बावजूद कचरे की मात्रा बढ़ी है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, प्रति तीर्थयात्री यात्रा के हिसाब से पैदा होने वाले कचरे की मात्रा करीब तीन गुना बढ़कर 33 ग्राम तक पहुंच गई. इससे संकेत मिलता है कि केवल यात्रियों की संख्या ही कचरा बढ़ने की वजह नहीं है. पैकेज्ड फूड, प्लास्टिक पैकेजिंग और अन्य इस्तेमाल की चीजों से निकलने वाला कचरा भी बड़ी भूमिका निभा सकता है.

ग्लेशियर के पास लैंडफिल से बढ़ा खतरा

सबसे गंभीर चिंता मिश्रित कचरे के निपटारे को लेकर है. रिपोर्ट के मुताबिक, मिश्रित कचरे को ग्लेशियर के पास लैंडफिल किया जा रहा है. ऊंचाई वाले इस संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में कचरे का लंबे समय तक जमा रहना पर्यावरण के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है. बारिश, बर्फ पिघलने और सतही जल के बहाव के साथ कचरे से निकलने वाले प्रदूषक आसपास के जल स्रोतों तक पहुंच सकते हैं. इससे मंदाकिनी नदी और आगे गंगा नदी के जल स्रोतों पर प्रदूषण का खतरा बढ़ सकता है.

यह भी पढ़ें: पितृ दोष से पाना चाहते हैं हमेशा के लिए मुक्ति? 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर कर लें यह अचूक उपाय

पर्यावरण संरक्षण की बढ़ी चुनौती

केदारनाथ हिमालय के बेहद संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्र में स्थित है. यहां हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं, जिससे स्थानीय प्रशासन के सामने कचरा प्रबंधन बड़ी चुनौती बन जाता है. 50.30 मीट्रिक टन कचरे का आंकड़ा यह सवाल भी उठाता है कि तीर्थयात्रा के साथ पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन को किस तरह संतुलित किया जाए. मिश्रित कचरे की जगह स्रोत पर ही कचरे को अलग करना, रीसाइक्लिंग बढ़ाना और संवेदनशील क्षेत्रों में लैंडफिल से बचना इस चुनौती से निपटने के अहम कदम हो सकते हैं.

भारत एक्सप्रेस

Swati Pandey

Recent Posts

Dhanteras 2026: धनतेरस पर क्यों खरीदते हैं नई चीजें? जानें खरीदारी का मुहूर्त और ‘यम दीप’ की मान्यता

Dhanteras kab hai: धनतेरस न केवल भौतिक वस्तुओं की खरीदारी का, बल्कि आरोग्य और सुरक्षा…

15 minutes ago

बिहार में एनडीए सरकार का एक वर्ष: 21 नवंबर को वैशाली के दौरे पर आ सकते हैं पीएम मोदी, बड़े उत्सव की तैयारी

20 नवंबर को बिहार में एनडीए सरकार के एक वर्ष का कार्यकाल पूरा हो रहा…

6 hours ago

मध्य प्रदेश में 63,296 करोड़ से बनेंगे 5 ग्रीनफील्ड कॉरिडोर, 1,398 KM का आधुनिक सड़क नेटवर्क तैयार

MP Greenfield Corridor: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मध्य प्रदेश में 63,296 करोड़ रुपये की…

6 hours ago