त्रेतायुग में राक्षसराज रावण ने अपने अत्याचार और कुकर्मों से पूरी दुनिया में त्राहि-त्राहि मचा दी थी. धर्मग्रंथों के अनुसार, वो कई लाख वर्षों तक जिंदा रहा. उसकी मौत तभी हुई, जब परमेश्वर ने श्रीराम के रूप में धरती पर मनुष्यावतार धारण किया.
वाल्मीकि रामायण महाकाव्य, शिव पुराण, स्कंद पुराण, पद्म पुराण और रावण संहिता में रावण के बारे में विस्तार से वर्णन मिलता है. रावण ने अपने भाइयों कुंभकर्ण और विभीषण के साथ हजारों वर्षों तक तपस्या की थी. लगभग 10 हजार वर्षों के तप के उपरांत ब्रह्माजी से उसे यह वरदान मिला था कि मनुष्य और रीछ-बंदरों के सिवाए उसे किसी भी प्राणी से भय नहीं रहेगा. यानी वो देवताओं, गंधर्वों या अन्य शक्तिशाली योनियों के लिए अवध्य हो गया.
ब्रह्माजी से अनेक वरदान मिलने के बाद रावण को घमंड हो गया था. वह एक बार जब कैलाश पर्वत पर गया था और वहां उसने कैलाश पर्वत को उठाने की चेष्टा की थी, तब भगवान शिव ने उसे दंडित किया था. ऐसा कहा जाता है कि 1000 वर्षों तक रावण का हाथ कैलाश पर्वत के नीचे दबा रहा और उसने बचने के लिए शिवजी को प्रसन्न किया. तब शिव जी ने प्रसन्न होकर रावण को कई वरदान दिए थे.
यहां ऐसे ही चुनिंदा कुछ सवाल हैं, साथ में जवाब पढिए-
रावण को दीर्घायु होने का वरदान भगवान ब्रह्मा से मिला था. रावण ने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या की थी और उनसे “न मरने का वरदान” मांगा था. हालांकि अमरत्व देने से ब्रह्माजी ने इनकार किया, लेकिन उन्होंने उसे यह वरदान दिया कि –
वह देवताओं, दानवों, गंधर्वों, यक्षों, राक्षसों आदि के हाथों नहीं मरेगा.
साथ ही, उसे दीर्घायु, महान बल, और अजेयता का वरदान मिला.
👉 मनुष्यों और वानरों से रावण ने मृत्यु का वर नहीं मांगा था, क्योंकि उन्हें वह तुच्छ समझता था.
हाँ, रावण ने सबसे पहले ब्रह्माजी की कठोर तपस्या की थी. उसने हजारों वर्षों तक तप कर अपने सिर एक-एक करके अग्नि को अर्पित कर दिए थे. जब नौ सिर जल चुके थे और वह दसवां काटने चला, तब ब्रह्माजी प्रसन्न हो गए और प्रकट होकर उसे वरदान दिया.
हाँ, ब्रह्मा जी के वरदानों से रावण अत्यंत शक्तिशाली और घमंडी हो गया था. उसने तीनों लोकों को जीतने का संकल्प लिया.
जब वह कैलाश पर्वत पहुंचा और भगवान शिव के निवास स्थान को भी अपने अधीन करना चाहा, तब उसने पूरा पर्वत ही उठाने की कोशिश की.
हाँ, यह प्रसिद्ध कथा शिव पुराण में मिलती है. रावण जब कैलाश पर्वत को उठाने लगा तो भगवान शिव ने अपने पैर का अंगूठा दबा दिया, जिससे पूरा पर्वत फिर से नीचे गिर गया. रावण का हाथ नीचे दब गया और वह भयंकर वेदना में चिल्लाने लगा. तब उसने “शिव तांडव स्तोत्र” की रचना की और हजारों वर्षों तक शिवजी के गुण गाता रहा.
शिवजी रावण की भक्ति और तपस्या से प्रसन्न हुए और उसे अनेक वरदान दिए, जिनमें प्रमुख ये थे:
1. असीम बल और पराक्रम
2. “चंद्रहास” नामक तलवार, जो अद्वितीय थी.
3. ज्ञान और संगीत में पारंगतता (रावण एक महान वीणा वादक भी था)
4. रावण को रुद्रगणों के समान शक्ति मिली
5. रावण को यह आशीर्वाद मिला कि जब तक वह शिवभक्त रहेगा, तब तक कोई उसे परास्त नहीं कर सकेगा.
यह भी पढ़िए: आज के दिन ही परमेश्वर ने लिया था श्रीराम अवतार, जानिए कैसा था उनका रंग-रूप, स्वभाव और गुण
LK Advani Health Update: लालकृष्ण आडवाणी की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें नई दिल्ली के…
UP News: लखनऊ में आयोजित डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह…
Faridabad Murder Case: दिल्ली से सटे फरीदाबाद के पल्ला थाना क्षेत्र में हवल में अंधी…
Jharkhand News: रांची के डोरंडा स्थित JAP-1 में 1880 से चली आ रही परंपरा के…
कर्नाटक के चामराजनगर में गूगल मैप के भरोसे रास्ता तलाश रहे 9 टेक प्रोफेशनल्स घने…
नर्मदापुरम की 2 साल की शिवानी शर्मा सड़क हादसे में ब्रेन डेड हुई, तो मजदूर…