आस्था

भोपाल का अनोखा मंदिर, नवरात्रि के दिनों में यहां फूल नहीं बल्कि चढ़ाए जाते हैं जूते-चप्पल

Bhopal Maa Siddhidatri Paharwala Temple: नवरात्रि (Navratri 2025) का पर्व पूरे देश में भक्ति के साथ मनाया जाता है. इन दिनों मंदिरों में देवी मां की आराधना के लिए फूल, नारियल, चुनरी और मिठाइयों का चढ़ावा आम बात है. लेकिन भारत में एक ऐसा अनोखा मंदिर है, यहां माता को भक्त फूल-मिठाई नहीं बल्कि नए जूते-चप्पल अर्पित करते हैं. ये मंदिर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल (Bhopal Unique Temple) स्थित है. यह परंपरा करीब 30 साल से चल रही है और इसके पीछे कई कथा जुड़ी है.

भोपाल के कोलार इलाके की पहाड़ियों पर स्थित सिद्धिदात्री पहाड़वाला मंदिर (Maa Siddhidatri Paharwala Temple) नवरात्रि के दिनों में श्रद्धालुओं का बड़ा केंद्र बन जाता है. सुबह से ही भक्त यहां दर्शन के लिए लंबी कतारों में खड़े दिखाई देते हैं. गर्भगृह तक पहुंचने के लिए करीब 300 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. खासियत यह है कि यहां लोग फल-फूल की बजाय बच्चों और महिलाओं के लिए नए फुटवियर लेकर पहुंचते हैं और देवी को अर्पित करते हैं.

पहाड़ों पर बसा सिद्धिदात्री मंदिर

इस परंपरा की नींव तीन दशक पहले रखी गई. मंदिर के संस्थापक ओमप्रकाश गुप्ता ने बताया कि कुछ भक्तों ने एक जैसा सपना देखा था, जिसमें देवी ने आदेश दिया कि कोई भी बच्ची नंगे पैर न चले. इसी संदेश के बाद 1994 में यहां शिव-पार्वती विवाह और यज्ञ का आयोजन किया गया और अगले ही वर्ष मंदिर का निर्माण हुआ. तभी से यहां जूते-चप्पल चढ़ाने की परंपरा लगातार जारी है.

स्थानीय श्रद्धालु मानते हैं कि माता सिद्धिदात्री हर मनोकामना पूरी करती हैं. जब किसी की इच्छा पूर्ण होती है, तो वह आभार जताने के लिए नए जूते-चप्पल चढ़ाता है. इसी वजह से यहां हर साल फुटवियर का अंबार लगता है. सामान्य दिनों में जहां 50 से 60 जोड़ी जूते-चप्पल चढ़ाए जाते हैं, वहीं नवरात्रि में यह संख्या हजारों तक पहुंच जाती है. मंदिर में जूते-चप्पल अर्पित करने की भी एक तय प्रक्रिया है. बच्चों के लिए खरीदे गए नए जूते-चप्पल सीधे माता को चढ़ाए जाते हैं, जबकि बड़ों के फुटवियर मंदिर परिसर में बने डिब्बों में जमा किए जाते हैं.

जरूरतमंद बच्चियों तक पहुंचती मदद

इस अनोखी परंपरा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां चढ़ाए गए सभी जूते-चप्पल बाद में गरीब और जरूरतमंद बच्चियों में बांट दिए जाते हैं. इससे उन मासूमों को राहत मिलती है, जिनके पास पहनने के लिए सही चप्पल तक नहीं होती. इस परंपरा की ख्याति अब सीमाओं से परे जा चुकी है. देश के अलग-अलग राज्यों से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग डाक के जरिए नए जूते-चप्पल भेजते हैं. इन्हें पहले देवी को अर्पित किया जाता है और बाद में जरूरतमंदों तक पहुंचा दिया जाता है.

श्रद्धा और समाजसेवा का संगम

आज यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है बल्कि सेवा और दान की भावना का प्रतीक भी बन चुका है. यहां की अनोखी परंपरा ने इसे खास पहचान दी है. नवरात्रि के मौके पर यह मंदिर इस बात का प्रमाण है कि भक्ति सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की मदद करके भी ईश्वर की सच्ची सेवा की जा सकती है.

ये भी पढ़ें: नवरात्रि में व्रत रखने के क्या है फायदे? सिर्फ धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक कारणों से भी है फायदेमंद, जानें कैसे

-भारत एक्सप्रेस 

निहारिका गुप्ता

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