Russian Maslenitsa Tradition Like Dussehra: शरद ऋतु की विदाई और उत्सवों की बहार के बीच भारत में जब दशहरे का पावन पर्व आता है, तो आकाश आतिशबाजी और जयकारों से गूंज उठता है. विशालकाय रावण के पुतले धू-धू कर जलते हैं और संदेश साफ होता है. अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हजारों मील दूर, बर्फीली हवाओं के देश रूस में भी बिल्कुल दशहरे जैसा ही एक त्योहार मनाया जाता है, जहां विशाल पुतले को अग्नि के हवाले कर उत्सव का समापन होता है?
रूस में इस सदियों पुराने लोकपर्व को ‘मस्लेनित्सा’ (Maslenitsa) कहा जाता है. जहां भारत में विजयादशमी पर रावण दहन अहंकार और बुराई के अंत का प्रतीक है, वहीं रूस में पुआल से बने पुतले को जलाकर कड़ाके की ठंड व अंधेरी सर्दियों को विदाई दी जाती है और नई शुरुआत व वसंत का स्वागत किया जाता है.
इस उत्सव के दो सबसे बड़े आधार हैं सूरज के रूप में ‘ब्लिनी’ (रूसी पैनकेक) और अंतिम दिन होने वाला पुतला दहन. रूसी संस्कृति में पैनकेक केवल एक व्यंजन नहीं है. गोल, गर्म और सुनहरा पैनकेक सीधे तौर पर चमकते सूरज और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. इसे कहीं शहद और मीठी बेरीज के साथ परोसा जाता है, तो कहीं मशरूम और नमकीन भरावन के साथ.
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त्योहार के अंतिम दिन यानी ‘फॉरगिवनेस संडे’ को खुले मैदान में जमा होकर लोग पुआल से बने ‘लेडी मस्लेनित्सा’ के पुतले को आग के हवाले करते हैं. यह अग्नि पुरानी नकारात्मकता, ठंड और आलस को भस्म कर जीवन में नई ऊष्मा के आगमन का ऐलान करती है.
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सरहदें, भाषाएं और मौसम भले ही बदल जाएं, लेकिन अंधेरे को मिटाकर रोशनी की ओर बढ़ने की मानवीय चाहत हर कोने में एक जैसी है. भारत का दशहरा जहां आसुरी प्रवृत्तियों को जलाकर धर्म की लौ जलाता है, वहीं रूस का मस्लेनित्सा कड़कड़ाती ठंड की विदाई कर प्रकृति के नए जीवन का उत्सव मनाता है. आग की लपटों में पुतले का स्वाहा होना इस बात का सबूत है कि दुनिया चाहे कितनी भी अलग हो, अंत में हर सभ्यता पुराने को त्यागकर एक नई और उजली शुरुआत की ही कामना करती है.
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