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Sawan 2025: कश्मीर का प्राचीन ज्येष्टेश्वर शिव मंदिर को क्यों कहा जाता है शंकराचार्य मंदिर

Sawan 2025: कश्मीर के श्रीनगर स्थित शंकराचार्य मंदिर को ज्येष्टेश्वर मंदिर भी कहा जाता है. यह मंदिर शिव को समर्पित है. गोपादरी पहाड़ी पर स्थित ये मंदिर की नायब स्थापत्य कला देखते ही बनती है. ये अष्टकोणीय बेसमेंट पर बना है. इसकी नींव काफी ठोस है. 371 ईसवी पूर्व बने इस मंदिर से कश्मीर को वादियों का नजारा काफी आकर्षक है. यहां सावन के महीने में काफी दूर दूर से शिव भक्त आते हैं. ये सभी पूजा अर्चना कर शिव का आशीर्वाद लेते हैं.

प्राचीन ज्येष्टेश्वर मंदिर का नाम क्यों पड़ा शंकराचार्य मंदिर

मान्यताओं के अनुसार ज्येष्टेश्वर मंदिर का निर्माण बौद्ध सम्राट अशोक के पुत्र जालुका ने करवाया था. आदि शंकराचार्य इस मंदिर में आए थे और यहां कई दिन रुके भी थे. तभी से ये मंदिर उनके नाम से प्रचलित हो गया. कश्मीरी हिंदुओं के लिए यह एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान माना जाता है. शंकराचार्य मंदिर समुद्रतल से 6240 फीट ऊंचाई पर स्थित है. श्रद्धालुओं को मंदिर तक जाने के लिए 243 सीढ़ियों पर चढ़कर जाना पड़ता है. मंदिर के गर्भगृह में एक काफी प्राचीन शिवलिंग है. शंकराचार्य मंदिर को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया है. यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है.

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मंदिर परिसर में हैं तीन सौ से ज्यादा मूर्तियां

मंदिर में 300 से ज्यादा मूर्ति मूर्तियां हैं लेकिन मंदिर के मध्य में भगवान शंकर लिंगम के रूप में विराजमान हैं. इतिहासकारों के मुताबिक सुल्तान सिकंदर ने शंकराचार्य मंदिर में काफी तोड़ फोड़ की थी. इससे यहां काफी नुकसान हुआ था. इस मंदिर का जीर्णोद्वार डोगरा शासक राजा रणवीर सिंह ने किया था. सन 1961 में द्वारिका पीठ के शंकराचार्य ने यहां आदि शंकराचार्य की एक विशालकाय मूर्ति स्थापित की. यह मंदिर हिंदू और बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए पवित्र माना जाता है. मंदिर से डल लेक और श्रीनगर का नजारा लोगों का मन मोह लेता है.

शंकराचार्य मंदिर (ज्येष्टेश्वर मंदिर) जाने का रास्ता

शंकराचार्य मंदिर सुबह 8 बजे से रात्रि 8 बजे तक खुला रहता है. मंदिर तक जाने के लिए नीचे से प्रवेश 5 बजे शाम से बंद कर दिया जाता है. मंदिर में नीचे से 243 सीढ़ियां चढ़ने पर लगभग एक से डेढ़ घंटे का समय आग जाता है.

मंदिर जाने के दो रास्ते हैं, एक दुर्गानाग से जाता है. इस रास्ते मंदिर तक चढ़ाई साढ़े तीन किलोमीटर है. इस रास्ते पर काफी मनोरम दृश्य देखने को मिलते हैं. डल झील,चार मीनार,मुगल गार्डन को देखा जा सकता है.
दूसरा रास्ता नेहरू पार्क से होकर जाता है. यह रास्ता 5 किलोमीटर का है. सन 1974 में इस रास्ते पर टेलीविजन टावर लग गया था. इसके बाद समय के साथ साथ सैनिक कैंप भी यहां स्थापित हो चुका है.

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– भारत एक्सप्रेस 

सुशील कुमार तिवारी

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