उत्तर प्रदेश

22 दिन जेल, 17 साल की लड़ाई: एक ‘गलत नाम’ ने कैसे तबाह कर दी राजवीर यादव की जिंदगी?

Uttar Pradesh News: ‘नाम में क्या रखा है’ इस शब्द को शेक्सपियर ने कई साल पहले कहा था. तब वो नाम के स्थान पर काम के महत्व को दिखाना चाहते थे. अमूमन लोग इस वाक्यांस का प्रयोग नाम और नाम की तुलना काम से करने के लिए करते हैं. इसमें नाम को तवज्जो थोड़ा कम दी जाती है. आज के दौर में आप ये समझ लीजिए की नाम में ही सब रखा है. एक गलत नाम आपको आबाद और बर्बाद भी कर सकता है. इसका जीता जागता उदाहरण उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में रहने वाले राजवीर यादव है. इन्होंने पुलिस की नाम को लेकर की गई इस गलती के कारण 22 दिन जेल में बिताए और 17 साल अपनी बेगुनाही की लड़ाई लड़ी. अब सवाल उठता है कि आखिर इसके लिए दोषी कौन है?

मैनपुरी जिले में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक व्यक्ति को 17 साल तक झूठे आरोपों में फंसाए रखा गया. राजवीर सिंह यादव को पुलिस ने गलत तरीके से गिरफ्तार किया था, जबकि उनका भाई रामवीर ही वास्तविक आरोपी था. इस मामले में अदालत ने अब राजवीर को बरी कर दिया है और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए हैं.

क्या है मामला?

31 अगस्त 2008 को मैनपुरी पुलिस ने एक एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें रामवीर सिंह यादव समेत चार लोगों को हत्या के प्रयास और एससी/एसटी एक्ट के तहत आरोपी बनाया गया था. लेकिन पुलिस ने गलती से राजवीर सिंह यादव को आरोपी बना दिया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. राजवीर ने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए 17 साल तक अदालत में लड़ाई लड़ी.

क्लर्क की गलती ने बदली जिंदगी

राजवीर यादव के वकील विनोद कुमार यादव ने बताया कि जब राजवीर को गिरफ्तार किया गया था, तब उन्होंने अदालत में अपनी बेगुनाही की दलील दी थी. अदालत ने पुलिसकर्मियों को तलब किया और SHO ओमप्रकाश ने माना कि राजवीर का नाम गलती से जोड़ा गया था. इसके बावजूद, पुलिस ने चार्जशीट में राजवीर का नाम रखा और मामला आगे बढ़ता रहा.

अदालत का फैसला

मैनपुरी कोर्ट ने राजवीर को बरी करते हुए कहा कि पुलिस की लापरवाही के कारण उन्हें 17 साल तक मानसिक और आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा. अदालत ने दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए हैं. राजवीर ने अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि वह दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हैं.

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परेशानियों का सामना

राजवीर ने बताया कि इस मामले के कारण उन्हें अपनी जिंदगी में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा. उन्होंने अपनी बेटियों की शादी के लिए संघर्ष किया और उनके बेटे को पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी. राजवीर ने कहा, “मैंने अपनी जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा इस मामले में खो दिया. अब मैं चाहता हूं कि दोषी पुलिसकर्मियों को सजा मिले.”

दोषी कौन?

इस मामले से सवाल खड़ा होता है कि आखिर दोषी कौन है? 17 साल का किसी झूठे आरोप में पिसता हुए एक आदमी ने अपने परिवार कुछ नहीं दे सका. इतना ही नहीं इन 17 सालों में वह प्रताड़ित भी हुआ. साथ ही उसे आर्थिक हानि भी हुई. जबकि, केस शुरू होने के कुछ दिन बाद ही उसकी बेगुनाही साबित हो गई थी. ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि आखिर दोषी कौन है? SI शिवसागर दीक्षित जिसने SHO के मानने और अदालत के आदेश के बाद भी चार्जशीट दाखिल कर दी या फिर वो कानूनी सिस्टम जो अपने आदेश के बाद भी यह नहीं जान पाया कि वह किसे पेशी पर बुला रहा है.

Shyamdatt Chaturvedi

श्यामदत्त चतुर्वेदी एक अनुभवी मीडिया पेशेवर हैं. वर्तमान में नोएडा 'भारत एक्सप्रेस' में पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में सात वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले श्यामदत्त ने हिंदी डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए कंटेंट राइटिंग, रिपोर्टिंग, एडिटिंग और डेटा एनालिसिस में गहरी विशेषज्ञता हासिल की है. इससे पहले उन्होंने जी न्यूज, ईटीवी भारत, टीएफआई मीडिया, वे2न्यूज और सैफायर मीडिया लिमिटेड (इंडिया डेली लाइव) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं. उन्होंने स्थानीय पंचायत से लेकर विधानसभा, लोकसभा तक की व्यापक कवरेज की. उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (IGNTU), अमरकंटक से पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातक (BJMC) करने के बाद, प्रतिष्ठित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मास्टर डिग्री (M.A.) हासिल की है.

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