Raja Bhaiya Horse Vijayraj: प्रतापगढ़ के कुंडा में अक्सर सियासी बवंडर उठता है, लेकिन इस बार चर्चा एक ‘शाही मेहमान’ की है. महाराष्ट्र से 1400 किलोमीटर का सफर तय कर एक ऐसा ‘दोस्त’ बेंती राजभवन पहुंचा है, जिसकी कीमत सुनकर अच्छे-अच्छों के पसीने छूट जाएं. मजे की बात यह है कि इस मेहमान के पास विदेश जाने जैसा अपना ‘पासपोर्ट’ है और यह अपनी पिछली तीन पीढ़ियों का इतिहास साथ लेकर चलता है. आखिर कौन है यह ‘विजयराज’ जिसने राजा भैया का दिल जीत लिया है और क्यों इसकी चर्चा पूरे यूपी में हो रही है?
राजा भैया के अस्तबल में शामिल हुआ एक नया और बेहद खास मेहमान खबरों में है. महाराष्ट्र से चलकर प्रतापगढ़ की धरती ‘बेंती’ पहुंचे इस मेहमान का नाम ‘विजयराज’ है, जिसकी कीमत करीब 1.5 करोड़ रुपये बताई जा रही है.
खास बात यह है कि करीब डेढ़ करोड़ की कीमत वाला यह शानदार अश्व राजा भैया ने खरीदा नहीं है, बल्कि यह उनके एक करीबी मित्र ने उन्हें उपहार स्वरूप भेंट किया है. छत्रपति शिवाजी महाराज की वीर भूमि महाराष्ट्र से जब यह घोड़ा अवध की धरती पर उतरा, तो इसका स्वागत किसी राजकुमार की तरह किया गया. पारंपरिक विधि-विधान से पूजन के बाद ही इसे राजभवन के बेड़े में शामिल किया गया, जो राजा भैया के पशु-प्रेम और राजसी जीवनशैली को दर्शाता है.
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‘विजयराज’ कोई साधारण घोड़ा नहीं, बल्कि शुद्ध मारवाड़ी नस्ल का एक नायाब नमूना है. इसकी मजबूत कद-काठी, चमकदार त्वचा और राजसी चाल इसे दूसरे घोड़ों से बिल्कुल अलग बनाती है. बेंती राजभवन के अस्तबल में यूं तो कई घोड़े हैं, लेकिन विजयराज की एंट्री ने वहां की रौनक बढ़ा दी है. इसकी कीमत 1.5 करोड़ रुपये आंकी गई है, जो इसे बेहद बेशकीमती बनाती है.
आपको जानकर हैरानी होगी कि ‘विजयराज’ इंसानों की तरह अपना खुद का आधिकारिक पासपोर्ट रखता है. इस पासपोर्ट में न केवल उसकी ऊंचाई, रंग और नस्ल का जिक्र है, बल्कि उसकी पिछली तीन पीढ़ियों की पूरी वंशावली भी दर्ज है. यह दस्तावेज इस बात का प्रमाण है कि विजयराज एक ‘हाई-प्रोफाइल’ घोड़ा है. इसकी प्रमाणित करने के लिए बाकायदा डीएनए रिपोर्ट भी तैयार की गई है. आमतौर पर ऐसे दस्तावेज केवल रेसकोर्स या राजघराने के बेहद खास घोड़ों के लिए ही जारी किए जाते हैं.
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‘विजयराज’ सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि कुंडा के राजसी वैभव का नया प्रतीक (Status Symbol) बन गया है. यह उपहार न केवल दो मित्रों के बीच के प्रगाढ़ संबंधों को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि आधुनिकता के दौर में भी राजा भैया अपनी परंपराओं और शौकों को कितनी संजीदगी से निभाते हैं. अब देखना होगा कि कुंडा की सड़कों पर जब राजा भैया ‘विजयराज’ की सवारी करेंगे, तो वह नजारा कैसा होगा.
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