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1942 का जनविद्रोह: जब आम जनता, किसानों और आदिवासियों ने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी

1942 का भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का ऐसा दौर था, जब देश के अलग-अलग हिस्सों में आम लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. इस संघर्ष को अक्सर महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए आंदोलन के रूप में याद किया जाता है, लेकिन इसकी कहानी इससे कहीं ज्यादा व्यापक थी. इसमें किसान, आदिवासी, स्थानीय क्रांतिकारी संगठन और आजाद हिंद फौज से प्रेरित लोग भी सक्रिय थे. बिहार से लेकर महाराष्ट्र और बंगाल तक अंग्रेजों के खिलाफ विरोध की आवाज बुलंद हो रही थी. कई जगहों पर लोगों ने अपनी जान की परवाह किए बिना ब्रिटिश शासन को चुनौती दी.

गांधी और 1942 के आंदोलन को लेकर विवाद

1942 में जब भारत छोड़ो आंदोलन ने जोर पकड़ा, तब दुनिया भी दूसरे विश्वयुद्ध की आग में झुलस रही थी. जर्मनी को सोवियत संघ के मोर्चे पर लगातार झटके लग रहे थे और बाद में मित्र देशों की सेनाओं के फ्रांस में उतरने से युद्ध की दिशा बदलने लगी थी. इसी बीच भारत में अंग्रेजों के खिलाफ जनआक्रोश तेजी से फैल रहा था.

महात्मा गांधी ने वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो को कई पत्र लिखकर आंदोलन को लेकर अपना पक्ष स्पष्ट करने की कोशिश की. उनका कहना था कि कांग्रेस की बैठक में दिया गया ‘करो या मरो’ का नारा एक खास राजनीतिक संदर्भ में था और हिंसक गतिविधियों को उनके व्यक्तिगत सत्याग्रह से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने तोड़फोड़ करने वालों को अपने आंदोलन की विचारधारा से अलग बताया.

हालांकि, अंग्रेजी सरकार ने गांधी की सफाई पर भरोसा नहीं किया. उस समय बड़े उद्योगपतियों के एक वर्ग ने भी गांधी के बजाय जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल के साथ खड़े होने का रास्ता चुना. इन घटनाओं के बीच कांग्रेस की राजनीति में गांधी की भूमिका और प्रभाव को लेकर भी कई तरह की परिस्थितियां बनीं.

आंदोलन में सिर्फ भीड़ नहीं, संगठित क्रांतिकारी भी थे सक्रिय

भारत छोड़ो आंदोलन को केवल स्वतःस्फूर्त हिंसा या कुछ लोगों की तोड़फोड़ तक सीमित कर देना इसके व्यापक स्वरूप को नजरअंदाज करना होगा. इस दौरान कई इलाकों में संगठित समूह अंग्रेजों के खिलाफ सक्रिय थे. उत्तर प्रदेश और बिहार में अलग-अलग क्रांतिकारी कार्यकर्ता, किसान नेता और स्थानीय संगठन आंदोलन को आगे बढ़ाने में जुटे थे.

इनमें केशव प्रसाद शर्मा, शिवदास घोष, शीलभद्र याजी, धनराज शर्मा, लंबोदर मुखर्जी और उषा मुखर्जी जैसे नामों का उल्लेख मिलता है. किसान सभा से जुड़े संतलाल सिंह, संतोष शर्मा, संध्या देवी और रामलोचन सिंह जैसे कार्यकर्ता भी अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय थे.

महेंद्र गोप का समूह और परशुराम दल भी ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे. इस गतिविधि की कीमत कई क्रांतिकारियों को चुकानी पड़ी. परशुराम सिंह को मई 1943 में गिरफ्तार किया गया. महेंद्र गोप भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए, जबकि उनके साथी महेंद्र चौधरी को फांसी दे दी गई.

इन घटनाओं से साफ होता है कि आंदोलन के दौरान अलग-अलग इलाकों में स्थानीय स्तर पर भी प्रतिरोध के प्रयास चल रहे थे. इन समूहों के काम करने के तरीके भले ही अलग रहे हों, लेकिन अंग्रेजी शासन का विरोध उनकी गतिविधियों का अहम हिस्सा था.

सुभाषचंद्र बोस के संदेशों से बढ़ रहा था जोश

देश के बाहर से नेताजी सुभाषचंद्र बोस की अपीलें भी भारतीयों तक पहुंच रही थीं. आजाद हिंद फौज के जरिए अंग्रेजों को चुनौती देने की उनकी कोशिशों ने स्वतंत्रता आंदोलन के एक हिस्से को नई प्रेरणा दी. कई क्रांतिकारी कार्यकर्ता इन संदेशों से प्रभावित थे और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाना चाहते थे.

1943 में एन.जी. रंगा, इंदुलाल याज्ञिक और स्वामी सहजानंद सरस्वती जैसे किसान नेताओं ने भी अंग्रेजों को देश से बाहर करने की मांग को लेकर किसानों को प्रेरित किया. स्वामी सहजानंद सरस्वती ने संघर्ष को संगठित करने के लिए मिलिशिया बनाने की दिशा में भी प्रयास किए. यदुनंदन शर्मा और गया के इमामगंज क्षेत्र से जुड़े जगलाल चौधरी जैसे लोग भी इस गतिविधि में शामिल थे.

इसलिए 1942 के आंदोलन को केवल गांधी के व्यक्तिगत सत्याग्रह या कुछ स्थानों पर हुई हिंसक घटनाओं के नजरिए से देखना इसकी पूरी तस्वीर पेश नहीं करता. इसके पीछे जनता का गुस्सा, राजनीतिक असंतोष और आजादी पाने की तीव्र इच्छा भी थी.

उस दौर में लिखे और गाए गए लोकगीत इस बात की झलक देते हैं कि स्वतंत्रता की लड़ाई आम लोगों की भावनाओं में कितनी गहराई तक उतर चुकी थी. इन गीतों में अंग्रेजों के जाने की उम्मीद, नेताजी के प्रति सम्मान और विदेशी शासन के खिलाफ खुली चुनौती दिखाई देती है.

एक लोकगीत में कहा गया है, ‘बांध ले बिस्तर फिरंगी, राज अब जाने को है.’ इन पंक्तियों में अंग्रेजी हुकूमत के अंत की उम्मीद और जनता के बढ़ते आत्मविश्वास की झलक मिलती है.

इसी तरह कुछ गीतों में सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज और विदेशों में उनके संघर्ष का जिक्र मिलता है. महिलाएं भी गीतों के माध्यम से आजादी की लड़ाई में भागीदारी का संकल्प व्यक्त करती थीं. हाथ में झंडा लेकर जुलूस निकालने की बात करने वाली पंक्तियां बताती हैं कि स्वतंत्रता का विचार समाज के अलग-अलग वर्गों में फैल रहा था.

ये लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं थे. वे उस समय के राजनीतिक माहौल, लोगों की उम्मीदों और अंग्रेजी शासन के प्रति नाराजगी को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं.

बिहार के लाठी पहाड़ में आदिवासियों ने दिखाई बहादुरी

बिहार में स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी लाठी पहाड़ के संघर्ष के बिना अधूरी मानी जाएगी. देवघर के पास स्थित इस क्षेत्र में संथाल आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में भाग लिया. स्थानीय नेताओं सियाराम सिंह और लंबोदर मुखर्जी के आह्वान पर कई लोगों ने इस लड़ाई में हिस्सा लिया.

इस संघर्ष से जुड़े नामों में साधु बाबा, कादू मुर्मू, गेरुआ बाबा, नीमचांद, चरण मुर्मू, पाईका मुर्मू, भादों हेमरम, बरियार हेमरम, पागल मुर्मू, सुमू मुर्मू और तलासी मांझी जैसे लोगों का उल्लेख मिलता है. इनके अलावा सर्वानंद मिश्र, भगवान चंद्र दास, आनंदमयी चटर्जी, डॉ. अनिमा भट्टाचार्य और रामजी बेन सहित कई अन्य लोगों ने भी इस संघर्ष में भूमिका निभाई.

बताया जाता है कि लाठी पहाड़ के संघर्ष में करीब 80 लोग शहीद हुए. यह संख्या बताती है कि आजादी की लड़ाई में आदिवासी समुदायों ने भी भारी कीमत चुकाई थी. उनका योगदान अक्सर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित नेताओं की कहानियों के पीछे छूट जाता है, जबकि स्थानीय स्तर पर उनका प्रतिरोध बेहद महत्वपूर्ण था.

सियाराम सिंह की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने बिछाया जाल

बिहार के क्रांतिकारी सियाराम सिंह अंग्रेजी पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बने हुए थे. 6 जनवरी 1944 को भागलपुर दियारा और नाग फोर्ट का दौरा करने के बाद वे 10 जनवरी को रानूचक पहुंचे. पुलिस को उनकी मौजूदगी की जानकारी मिली तो उसने गांव की घेराबंदी कर दी.

इस कार्रवाई के दौरान रामनारायण चौधरी और तेंतरू गुरुजी को गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन सियाराम सिंह ग्रामीणों की मदद से पुलिस को चकमा देने में सफल रहे. उन्हें भूसे के एक बड़े ढेर में छिपा दिया गया.

पुलिसकर्मी उनकी तलाश में भूसे को राइफल की नोक से कुरेदते रहे. इस दौरान सियाराम सिंह की हालत ऐसी हो गई कि वे दम घुटने के कारण बेहोश हो गए. हालांकि, वे पुलिस की पकड़ में नहीं आए. जब पुलिस वहां से चली गई, तो एक मजबूत कद-काठी वाले व्यक्ति ने उन्हें बाहर निकाला और गंगा किनारे पहुंचाया. कई घंटे बाद उन्हें होश आया.

यह घटना बताती है कि उस समय क्रांतिकारियों की मदद करने में स्थानीय ग्रामीणों ने भी जोखिम उठाया था. अंग्रेजी पुलिस के दबाव के बावजूद लोगों का सहयोग भूमिगत आंदोलनकारियों के लिए बेहद अहम साबित हुआ.

गिरफ्तारी अभियान के बावजूद जारी रहा संघर्ष

1944 तक पुलिस ने सियाराम सिंह के कई सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया था. इनमें गोविंद सिंह, महेंद्र चौधरी, विंदेश्वरी प्रसाद, गणेश साहू, पद्मन सिंह और कारे ताती जैसे नाम शामिल थे. इसके बावजूद कई क्रांतिकारी लंबे समय तक पुलिस की पहुंच से बाहर रहे.

संजीवन धानुक, पार्थ ब्रह्मचारी, सियाराम सिंह और रामबहादुर सिंह सहित 64 लोगों के गिरफ्तार नहीं होने का उल्लेख मिलता है. इस दल को श्रीकृष्ण सिंह और विनोदानंद झा का समर्थन प्राप्त था.

10 जून 1945 को ‘सर्चलाइट’ अखबार में पुलिस दमन से जुड़ी विस्तृत खबर प्रकाशित हुई. बताया जाता है कि पुलिस ने क्रांतिकारियों के बारे में जानकारी जुटाने के लिए काफी संसाधन खर्च किए, लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली. सियाराम सिंह तब तक भूमिगत रहे, जब तक बिहार में श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में सरकार नहीं बनी.

सियाराम सिंह की तुलना बंगाल के प्रसिद्ध क्रांतिकारी सूर्यसेन से भी की जाती है. इस तुलना के पीछे उनका साहस, संगठन क्षमता और अंग्रेजी शासन के खिलाफ लंबे समय तक संघर्ष करते रहना प्रमुख कारण माना जाता है.

आजादी की लड़ाई में जनभागीदारी का बड़ा महत्व

1942 का जनविद्रोह, 1946 का नौसेना विद्रोह और आजाद हिंद फौज के सैनिकों पर चले मुकदमों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ देश में माहौल को और मजबूत किया. अलग-अलग घटनाओं ने भारतीयों के भीतर आजादी की भावना को तेज किया और अंग्रेजी हुकूमत के सामने शासन जारी रखने की चुनौती बढ़ाई.

भारत की स्वतंत्रता किसी एक नेता, संगठन या आंदोलन का परिणाम नहीं थी. गांधी के नेतृत्व में चले अहिंसक संघर्ष के साथ-साथ क्रांतिकारियों, किसानों, मजदूरों, आदिवासी समुदायों और आजाद हिंद फौज से जुड़े प्रयासों ने भी इसमें योगदान दिया. इन सभी की भूमिका को समझना जरूरी है, ताकि स्वतंत्रता संग्राम की तस्वीर अधूरी न रहे.

1942 का आंदोलन इसी व्यापक संघर्ष का एक महत्वपूर्ण अध्याय था. बिहार के गांवों से लेकर देश के दूसरे हिस्सों तक लोगों ने अपने तरीके से अंग्रेजी शासन का विरोध किया. कई लोग गिरफ्तार हुए, कई ने अपनी जान गंवाई और अनेक कार्यकर्ता वर्षों तक भूमिगत रहकर संघर्ष करते रहे.

यह भी पढ़ें- भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन सहित कई नेताओं ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को दी जन्मदिन की बधाई

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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