आज का युवा विज्ञान, तकनीक और दुनिया भर की बदलती जीवनशैली से तेजी से जुड़ रहा है. ऐसे समय में अपनी संस्कृति, परंपरा, धर्म और राष्ट्रबोध को लेकर उसके मन में कई तरह के सवाल उठना स्वाभाविक है. आखिर हमारी सभ्यता क्या कहती है? धर्म को केवल आस्था के रूप में देखा जाए या उसे समझने की भी कोशिश की जाए? और आधुनिक सोच के साथ अपनी सांस्कृतिक पहचान को कैसे जोड़ा जाए?
इन्हीं सवालों के बीच लेखक अभिजीत सिंह की पुस्तक ‘अमृत कुम्भ: हिन्दू भाव का मंगल कलश’ चर्चा में आती है. पुस्तक का खास पहलू यह है कि लेखक इन विषयों को किसी भारी-भरकम धार्मिक ग्रंथ की तरह नहीं, बल्कि कहानी और संवाद के जरिए सामने रखते हैं.
पुस्तक की कहानी एक ऐसे युवक के इर्द-गिर्द घूमती है जो इसरो में वैज्ञानिक के तौर पर काम करता है. परिस्थितियां उसे एक स्कूल तक ले जाती हैं, जहां उसे दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों के साथ बातचीत करने का मौका मिलता है.
इस स्कूल की संस्थापक की कोशिश थी कि बच्चों को धर्म, संस्कृति और राष्ट्र से जोड़ा जाए. लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाए. इसके बाद वैज्ञानिक युवक इस जिम्मेदारी को स्वीकार करता है. वह बच्चों को केवल तैयार जवाब नहीं देता, बल्कि उनके मन में उठने वाले सवालों को सुनता है और उनके साथ बातचीत करते हुए हिन्दू धर्म, संस्कृति, सभ्यता और राष्ट्र से जुड़े विषयों को समझाने की कोशिश करता है.
यहीं पुस्तक की कहानी दिलचस्प बनती है. बच्चों के सवाल आज के दौर के सवाल हैं—तर्क, पहचान, परंपरा और आधुनिकता से जुड़े सवाल. इनका जवाब देने वाला पात्र खुद वैज्ञानिक पृष्ठभूमि से आता है. इसलिए कहानी में आस्था और तर्क के बीच संवाद का एक अलग नजरिया देखने को मिलता है.
पुस्तक की उपन्यासात्मक शैली इसे सामान्य वैचारिक या धार्मिक किताबों से अलग बनाती है. कठिन लगने वाले विषय बातचीत और घटनाओं के जरिए सामने आते हैं. इससे पाठक को ऐसा महसूस नहीं होता कि वह किसी लंबे उपदेश को पढ़ रहा है.
खास तौर पर युवा पाठकों के लिए यह तरीका उपयोगी हो सकता है, क्योंकि आज की पीढ़ी अक्सर किसी भी विचार को बिना सवाल किए स्वीकार करने के बजाय उसका कारण जानना चाहती है. पुस्तक इसी जिज्ञासा को संवाद का आधार बनाती है.
पुस्तक का शीर्षक स्वामी विवेकानंद के उस विचार से प्रेरित बताया गया है, जिसमें उन्होंने हिन्दू सभ्यता को जीवित रखने वाले ‘अमृत कुम्भ’ की बात की थी. इसी विचार को लेखक ने अपनी पुस्तक की केंद्रीय अवधारणा बनाया है.
यहां ‘अमृत कुम्भ’ केवल धार्मिक प्रतीक नहीं रह जाता, बल्कि हिन्दू भाव, सांस्कृतिक चेतना और आत्मगौरव के प्रतीक के रूप में सामने आता है. लेखक का प्रयास है कि इस भाव को नई पीढ़ी के सामने ऐसे तरीके से रखा जाए, जिसे वह समझ सके और अपने संदर्भ में देख सके.
अभिजीत सिंह मूल रूप से मुज़फ्फरपुर, बिहार के रहने वाले हैं. अपने पेशेवर जीवन के साथ वह धर्म, संस्कृति और सभ्यतागत विषयों का अध्ययन करते रहे हैं. सोशल मीडिया पर भी उनके विचारों को युवाओं के बीच पहचान मिली है.
इससे पहले उनकी पुस्तक ‘इनसाइड द हिंदू मॉल’ भी पाठकों का ध्यान आकर्षित कर चुकी है. उसमें हिन्दू परंपरा से जुड़ी बुनियादी अवधारणाओं को आधुनिक संदर्भ में आसान भाषा में समझाने की कोशिश की गई थी. ‘अमृत कुम्भ’ को इसी वैचारिक यात्रा की अगली कड़ी के रूप में देखा जा सकता है.
आज धर्म, संस्कृति और राष्ट्रबोध को लेकर समाज में लगातार चर्चा हो रही है. एक तरफ आधुनिकता और वैश्विक संस्कृति का प्रभाव है, तो दूसरी तरफ अपनी परंपराओं और जड़ों को समझने की बढ़ती इच्छा भी दिखाई देती है. ऐसे माहौल में कई युवाओं के सामने यह सवाल रहता है कि अपनी सांस्कृतिक पहचान को आधुनिक जीवन के साथ कैसे समझा जाए.
‘अमृत कुम्भ’ इसी सवाल के आसपास संवाद खड़ा करती है. पुस्तक का दावा केवल जानकारी देने तक सीमित नहीं है; इसकी कहानी बच्चों के सवालों और उनके जवाबों के जरिए पाठक को खुद सोचने के लिए भी प्रेरित करती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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