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आरा के स्कूल से दिल्ली के सिंहासन तक; बाबू जगजीवन राम की वो कहानी, जिसने बदली देश की तकदीर

आज बाबू जगजीवन राम का जन्मदिन हैं, जिन्होंने सिर्फ राजनीति में नहीं, बल्कि समाज में भी अपनी अलग पहचान बनाई है. बिहार के भोजपुर जिले के चांदवा गांव में 5 अप्रैल 1908 को जन्मे बाबू जगजीवन राम का जीवन पूरी तरह से संघर्ष और सिद्धांतों से भरा रहा है. दलित परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने हर मुश्किल का सामना किया और साबित कर दिया कि समाज की किसी भी दीवार को तोड़ा जा सकता है.

शिक्षा और शुरुआती संघर्ष

बचपन में ही उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा. आरा टाउन स्कूल में पढ़ाई के दौरान उन्हें अलग घड़े से पानी पीना पड़ता था, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. पिता के निधन के बाद मां वसंती देवी की प्रेरणा से उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तथा कलकत्ता विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त की.

1934 में कलकत्ता में बाबू जी ने अखिल भारतीय रविदास महासभा और अखिल भारतीय दलित वर्ग लीग की स्थापना की, ताकि दलित समाज को स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय किया जा सके. मात्र 27 साल की उम्र में 1935 में रांची में हैमंड कमीशन के सामने जाकर दलितों के वोटिंग अधिकार की मांग की. यह वाकई एक ऐतिहासिक क्षण था.

राजनीतिक सफर और उपलब्धियां

1936 में बिहार विधान परिषद के सदस्य बने और 1937 में कांग्रेस सरकार में शिक्षा एवं विकास मंत्रालय में संसदीय सचिव नियुक्त हुए. फिर 1940 में गांधीजी से प्रेरित होकर सत्याग्रह में गिरफ्तारी दी.

उनका संसदीय जीवन ही अपने आप में विश्व रिकॉर्ड है. 1936 से 1986 तक लगातार 50 साल तक वे संसद में सक्रिय रहे. 1952 से 1986 तक सासाराम से लोकसभा सदस्य रहे और नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले — श्रम, रेलवे, परिवहन, संचार, खाद्य एवं कृषि, सिंचाई और रक्षा.

  • कृषि मंत्री के रूप में हरित क्रांति की गति दी और भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया.
  • रक्षा मंत्री के रूप में 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई, जिससे बांग्लादेश का निर्माण हुआ.
  • उप-प्रधानमंत्री के रूप में भी काम किया (1977-79, मोरारजी देसाई सरकार में).

समाज और विरासत

बाबू जगजीवन राम ने साबित किया कि जाति की दीवारें आपके सपनों को रोक नहीं सकतीं. उन्होंने दलितों को राजनीति और सामाजिक न्याय के मुख्यधारा में लाया. डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने उन्हें ‘भारत के चोटी के विचारक और भविष्यद्रष्टा’ कहा, जबकि महात्मा गांधी उन्हें ‘कंचन’ यानी सोना कहते थे.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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