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PM की रेस में ‘शून्य’ पर थे नेहरू, फिर कैसे पलटी बाजी? जानें 1946 के कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव का वो फैसला

1946 का साल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अंतिम चरण का था. ब्रिटिश सरकार कैबिनेट मिशन के माध्यम से सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया चला रही थी. कांग्रेस पार्टी को अपना नया अध्यक्ष चुनना था, क्योंकि मौलाना अबुल कलाम आजाद का कार्यकाल समाप्त हो रहा था. उस समय कांग्रेस अध्यक्ष पद विशेष महत्वपूर्ण था—यह पद धारण करने वाला नेता अंतरिम सरकार (Interim Government) का प्रमुख बनने वाला था, जो बाद में स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बन जाता.

नामांकन की अंतिम तिथि 29 अप्रैल 1946 थी. प्रांतीय कांग्रेस समितियों (Provincial Congress Committees – PCCs) को नामांकन का अधिकार था. कुल 15 प्रांतीय समितियों में से 12 ने सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम प्रस्तावित किया. नेहरू का नाम किसी भी प्रांतीय समिति ने प्रस्तावित नहीं किया. कुछ समितियों ने नामांकन नहीं भेजा या अन्य नामों का समर्थन किया. नेहरू को संगठनात्मक स्तर पर शून्य समर्थन मिला.

क्या हुआ 29 अप्रैल को?

कांग्रेस कार्यसमिति (Congress Working Committee) की बैठक में आचार्य जे.बी. कृपलानी ने नेहरू का नाम प्रस्तावित किया. कुछ अन्य सदस्यों ने भी समर्थन किया, लेकिन प्रांतीय समितियों से कोई औपचारिक नामांकन नहीं था. नेहरू का नामांकन विवादास्पद था क्योंकि नियम के अनुसार प्रांतीय समितियां ही मुख्य रूप से नामांकन करती थीं.

सरदार पटेल संगठनात्मक रूप से मजबूत नेता थे. वे भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा चुके थे, रियासतों के एकीकरण के लिए जाने जाते थे और पार्टी की जमीनी कार्यप्रणाली में उनका दबदबा था. नेहरू लोकप्रिय थे, युवाओं और बौद्धिक वर्ग में उनकी छवि प्रगतिशील और अंतरराष्ट्रीय थी, लेकिन पार्टी के संगठनात्मक नेतृत्व में पटेल आगे माने जाते थे.

गांधी जी की भूमिका और प्रत्याशियों का हटना

महात्मा गांधी ने स्पष्ट रूप से नेहरू को प्राथमिकता दी. उन्होंने पटेल और कृपलानी से अनुरोध किया कि वे अपना नाम वापस ले लें. गांधी का तर्क था कि नेहरू की युवा ऊर्जा, लोकप्रियता और अंतरराष्ट्रीय छवि नए भारत के लिए बेहतर होगी. कुछ इतिहासकारों के अनुसार गांधी को लगता था कि नेहरू मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की मांग वाले माहौल में बेहतर तरीके से मुस्लिम समुदाय को जोड़ सकते हैं.

सरदार पटेल ने गांधी जी के प्रति गहरे सम्मान के कारण अपना नाम वापस ले लिया. कृपलानी ने भी पीछे हट गए. परिणामस्वरूप नेहरू बिना विरोध के कांग्रेस अध्यक्ष चुने गए. 6 जुलाई 1946 को उन्होंने पद संभाला.

अगस्त 1946 में वायसराय लॉर्ड वेवेल ने कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नेहरू को अंतरिम सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया. 2 सितंबर 1946 को नेहरू अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष (वायसराय अध्यक्ष थे) और वास्तविक कार्यकारी प्रमुख बने. 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता के बाद वे भारत के पहले प्रधानमंत्री बने.

विवाद और तथ्य

यह घटना आज भी विवादास्पद है. कुछ लोग इसे “वोट चोरी” या गांधी जी की व्यक्तिगत पसंद बताते हैं, जबकि अन्य इसे गांधी की दूरदर्शिता मानते हैं. वास्तविकता यह है कि:

  • कोई औपचारिक “15 वोट vs 0 वोट” वाली मतगणना नहीं हुई, क्योंकि नाम वापसी के बाद मतदान की जरूरत ही नहीं पड़ी.
  • प्रांतीय समितियों का समर्थन पटेल के पक्ष में था, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव अंततः कार्यसमिति और गांधी की सहमति से तय हुआ.
  • नेहरू की लोकप्रियता और मास अपील को भी ध्यान में रखा गया.

सरदार पटेल बाद में नेहरू सरकार में उप-प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने. दोनों नेताओं का गठबंधन (“unbreakable combination”) स्वतंत्र भारत के प्रारंभिक वर्षों में महत्वपूर्ण रहा—नेहरू विदेश नीति और विकास पर, जबकि पटेल रियासतों के एकीकरण और आंतरिक सुरक्षा पर फोकस करते रहे. पटेल की मृत्यु 1950 में हो गई.

29 अप्रैल 1946 की घटना लोकतंत्र, संगठनात्मक इच्छा और सर्वोच्च नेतृत्व की व्यक्तिगत पसंद के बीच टकराव का उदाहरण है. सरदार पटेल को पार्टी के भीतर स्पष्ट बहुमत मिला था, लेकिन गांधी जी की सिफारिश और पटेल की अनुशासनबद्धता ने नेहरू को रास्ता दिया. यह फैसला भारत के इतिहास की दिशा बदल गया.

कुछ इतिहासकार इसे गांधी की गलती मानते हैं, कुछ नेहरू की क्षमता की विजय. सच्चाई शायद दोनों के बीच कहीं है नेहरू की दृष्टि ने भारत को आधुनिक बनाने में योगदान दिया, जबकि पटेल की मजबूत इच्छाशक्ति ने देश को एक सूत्र में पिरोया. इतिहास हमेशा “क्या होता अगर…” के सवाल छोड़ता है, लेकिन 1946 का फैसला जैसा था, वैसा ही भारत ने स्वीकार किया.

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-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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