भारत के इतिहास में 1757 का साल सिर्फ प्लासी के युद्ध के लिए याद नहीं किया जाता. यह वह दौर था जब ईस्ट इंडिया कंपनी का रूप तेजी से बदल रहा था. जो कंपनी भारत में व्यापार करने आई थी, वह धीरे-धीरे सत्ता और प्रशासन में भी अपनी पकड़ मजबूत करने लगी. इसी बदलाव की एक अहम कड़ी थी 19 अगस्त 1757 को कोलकाता में कंपनी की टकसाल से जारी किया गया पहला रुपया.
यह सिक्का देखने में भले ही एक सामान्य मुद्रा जैसा लगता हो, लेकिन इसके पीछे उस समय की बदलती राजनीतिक और आर्थिक तस्वीर छिपी थी. प्लासी की लड़ाई में जीत के बाद कंपनी को बंगाल में अपना प्रभाव बढ़ाने का मौका मिला और सिक्का जारी करने का अधिकार मिलना इसी बढ़ती ताकत का हिस्सा था.
आज जब हम ईस्ट इंडिया कंपनी का नाम सुनते हैं तो सबसे पहले अंग्रेजी शासन की याद आती है. लेकिन शुरुआत में इसका मकसद शासन करना नहीं, बल्कि कारोबार करना था. कंपनी भारत और एशिया के दूसरे हिस्सों में रेशम, कपास, नील, चाय और नमक जैसी चीजों का व्यापार करती थी.
17वीं सदी के मध्य तक भारत में कंपनी की कई फैक्टरियां यानी व्यापारिक केंद्र बन चुके थे. कंपनी को अपने कारोबार के लिए अलग-अलग जगहों पर स्थानीय मुद्रा की जरूरत पड़ती थी. इसी वजह से उसने सिक्के बनाने की व्यवस्था पर भी ध्यान देना शुरू किया.
सूरत में कंपनी की शुरुआती टकसालों में से एक स्थापित हुई. बाद में 1636 में अहमदाबाद और 1672 में बॉम्बे में भी टकसालें शुरू की गईं. बॉम्बे में सोने, चांदी और तांबे के सिक्के बनाए जाते थे. उस समय इन सिक्कों के अलग-अलग नाम भी थे—सोने के सिक्के कैरोलिना, चांदी के एंजलीना और तांबे के सिक्के कॉपरून कहलाते थे.
साल 1757 में प्लासी की लड़ाई ने कंपनी की ताकत को एक नया आधार दिया. बंगाल के नवाब के साथ हुए समझौते के बाद कंपनी को सिक्के ढालने की अनुमति मिली. इसके बाद कोलकाता में कंपनी की अपनी टकसाल स्थापित की गई.
19 अगस्त 1757 को इसी टकसाल से एक रुपए का पहला सिक्का जारी किया गया. यह सिक्का बंगाल के मुगल प्रांत में चलाया गया. उस समय कंपनी को बंगाल और बिहार में राजस्व वसूली से जुड़े अधिकार भी हासिल हो रहे थे. यानी एक तरफ कंपनी व्यापार कर रही थी और दूसरी तरफ उसकी आर्थिक तथा राजनीतिक ताकत लगातार बढ़ रही थी.
कोलकाता की यह टकसाल पुराने किले के पास स्थित एक इमारत में बनाई गई थी और 1757 से 1791 तक वहां काम करती रही. इस लिहाज से पहला रुपया केवल मुद्रा का एक टुकड़ा नहीं था, बल्कि उस दौर में कंपनी के बढ़ते प्रभाव का एक महत्वपूर्ण निशान भी था.
उस समय भारत में आज जैसी एक समान मुद्रा व्यवस्था नहीं थी. अलग-अलग इलाकों में अलग तरह के सिक्के इस्तेमाल होते थे. बंगाल, मद्रास और बॉम्बे प्रेसिडेंसी में प्रचलित सिक्कों के वजन, आकार और मूल्य में भी अंतर था.
व्यापारियों के लिए यह स्थिति आसान नहीं थी. एक इलाके का सिक्का दूसरे इलाके में अलग मूल्य रख सकता था. लेन-देन में हिसाब-किताब जटिल हो जाता था और व्यापार में भी दिक्कतें आती थीं.
इस समस्या को दूर करने की दिशा में बाद में बड़ा कदम उठाया गया. 1835 में यूनिफॉर्म कॉइनेज एक्ट लागू किया गया, जिसके बाद एक समान सिक्का व्यवस्था की ओर बढ़ना शुरू हुआ. इन सिक्कों पर ब्रिटिश सम्राट विलियम चतुर्थ की तस्वीर और दूसरी तरफ अंग्रेजी तथा फारसी में मूल्य अंकित किया जाता था.
साल 1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास में एक और बड़ा मोड़ लेकर आया. इसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन समाप्त हुआ और भारत का प्रशासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया. इसके साथ ही सिक्कों पर ब्रिटिश सम्राटों की तस्वीर दिखाई देने लगी.
आगे चलकर प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान चांदी की कमी ने मुद्रा व्यवस्था को भी प्रभावित किया और कागजी नोटों का इस्तेमाल बढ़ा. भारत की आजादी 1947 में हुई, लेकिन औपनिवेशिक दौर के कई सिक्के कुछ समय तक प्रचलन में बने रहे और 1950 तक उनका इस्तेमाल होता रहा.
19 अगस्त 1757 को कोलकाता में ढाला गया पहला रुपया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी कहानी सिर्फ मुद्रा तक सीमित नहीं है. यह उस समय की तस्वीर दिखाता है जब एक विदेशी व्यापारिक कंपनी धीरे-धीरे भारत की आर्थिक व्यवस्था में अपनी जगह मजबूत कर रही थी और फिर राजनीतिक सत्ता की ओर बढ़ रही थी.
प्लासी की जीत से कंपनी को जो राजनीतिक बढ़त मिली, सिक्का जारी करने का अधिकार उसी बढ़ते प्रभाव का आर्थिक विस्तार था. इसलिए इस रुपये को भारतीय मौद्रिक इतिहास के साथ-साथ ईस्ट इंडिया कंपनी के सत्ता विस्तार की कहानी से भी जोड़कर देखा जाता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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