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मिजोरम के इस विधायक ने पेश की अनोखी मिसाल, 7.5 साल में दान कर दी पूरी सरकारी सैलरी

राजनीति में अक्सर नेताओं की संपत्ति और सुविधाओं को लेकर चर्चा होती रहती है, लेकिन मिजोरम से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने लोगों का ध्यान एक अलग वजह से खींचा है. मिजोरम के विधायक और पूर्व कैबिनेट मंत्री रॉबर्ट रोमाविया रॉयते ने पिछले साढ़े सात वर्षों में अपनी पूरी सरकारी सैलरी समाजसेवा के लिए दान कर दी. दिसंबर 2018 से जून 2026 तक लगातार 90 महीनों की उनकी पूरी तनख्वाह जरूरतमंद लोगों के कल्याण में खर्च हुई. इस दौरान दान की गई कुल राशि करीब 1.25 करोड़ रुपये बताई गई है.

रॉबर्ट रोमाविया रॉयते का कहना है कि उन्होंने 2018 के मिजोरम विधानसभा चुनाव से पहले ही अपने लिए दो बड़े फैसले किए थे. पहला, मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना और दूसरा, यदि जनता उन्हें चुनकर विधानसभा भेजती है तो वे अपनी पूरी सरकारी सैलरी गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए समर्पित कर देंगे.

चुनाव जीतने के बाद उन्होंने अपने इस संकल्प को सिर्फ घोषणा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि लगातार साढ़े सात साल तक पूरी ईमानदारी से निभाया. उनका कहना है कि भविष्य में भी वे इस पहल को जारी रखने की कोशिश करेंगे.

हर रुपये का रखा गया पूरा हिसाब

रॉयते ने बताया कि दान की गई पूरी राशि एक अलग चैरिटेबल अकाउंट के माध्यम से खर्च की गई. इस व्यवस्था का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि हर रुपये का रिकॉर्ड रहे और पैसा केवल सामाजिक कार्यों में ही इस्तेमाल हो.

इन 90 महीनों में उनके 60 महीने कैबिनेट मंत्री और 30 महीने विधायक के रूप में गुजरे. पूरे कार्यकाल के दौरान मिली सरकारी सैलरी का इस्तेमाल व्यक्तिगत जरूरतों के बजाय समाज के कमजोर वर्गों की मदद के लिए किया गया.

किन लोगों को मिली मदद?

दान की गई राशि से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सहायता दी गई. इसके अलावा पढ़ाई में आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे छात्रों की मदद की गई ताकि उनकी शिक्षा प्रभावित न हो. चर्चों, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) और समुदाय के विकास से जुड़ी कई योजनाओं को भी इस राशि से सहयोग मिला. रॉयते का कहना है कि उनका उद्देश्य केवल आर्थिक मदद देना नहीं था, बल्कि जरूरतमंद लोगों तक समय पर सहयोग पहुंचाना भी था.

कारोबारी होने की वजह से लिया यह फैसला

रॉबर्ट रोमाविया रॉयते सिर्फ राजनेता ही नहीं, बल्कि एक सफल उद्यमी भी हैं. उन्होंने नॉर्थ ईस्ट कंसल्टेंसी सर्विसेज (NECS), रॉयते फिशरीज और रॉयते ब्रिक इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियों की स्थापना की है. उनका कहना है कि व्यवसाय से मिलने वाली आय के कारण वे सरकारी वेतन पर निर्भर नहीं थे. यही वजह रही कि उन्होंने अपनी पूरी सैलरी समाज के लिए समर्पित करने का फैसला किया और उसे लगातार निभा भी सके.

जनसेवा और जवाबदेही का बना उदाहरण

रॉयते की यह पहल अब राजनीतिक जवाबदेही और निस्वार्थ जनसेवा के उदाहरण के तौर पर देखी जा रही है. कई रिपोर्टों में इस कदम की तुलना उस फैसले से भी की गई है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए अपनी निजी बचत राज्य सचिवालय के कर्मचारियों की बेटियों की शिक्षा के लिए दान की थी.

ये भी पढ़ें: “जमीन से बढ़कर देश है…”, भारत-बांग्लादेश बॉर्डर को सुरक्षित कराने के लिए हिंदू परिवारों ने दान दी जमीन, BSF ने जताया आभार

-भारत एक्सप्रेस

विशाल तिवारी, संपादकीय सलाहकार

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