Ganga Protection Movement: लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के जंतर-मंतर पर जारी अनशन के बीच, देश में एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण के सबसे बड़े स्तंभ प्रोफेसर जीडी अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) की यादें जीवंत हो उठी हैं. सोशल मीडिया से लेकर पर्यावरण गलियारों तक, लोग उनके उस ऐतिहासिक और अटूट संघर्ष को याद कर रहे हैं, जहां उन्होंने विज्ञान और आध्यात्म को मिलाकर मां गंगा की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी.
पर्यावरणविद् प्रोफेसर जीडी अग्रवाल (स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद) को आज सोनम वांगचुक के आंदोलन के बीच देश फिर से याद कर रहा है. आईआईटी कानपुर के पूर्व प्रोफेसर और बर्कले यूनिवर्सिटी के पीएचडी धारक अग्रवाल ने साल 2010 में संन्यास ले लिया था. उन्होंने गंगा को अविरल और निर्मल बनाने, बांधों को रोकने और अवैध खनन पर पाबंदी लगाने के लिए लंबा संघर्ष किया. साल 2018 में 111 दिनों के ऐतिहासिक आमरण अनशन के बाद उन्होंने अपना देह त्याग दिया, जिसकी गूंज आज भी देश के पर्यावरण आंदोलनों में सुनाई देती है.
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में जन्मे प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की यात्रा बेहद असाधारण रही. उन्होंने रुड़की यूनिवर्सिटी (अब आईआईटी रुड़की) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और शुरुआत में यूपी सिंचाई विभाग में बतौर डिजाइन इंजीनियर सेवाएं दीं. पर्यावरण के प्रति उनका जुनून उन्हें अमेरिका की मशहूर यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले ले गया, जहां से उन्होंने पर्यावरण इंजीनियरिंग में पीएचडी की उपाधि हासिल की. भारत लौटने के बाद उन्होंने आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर के रूप में कई पीढ़ियों को पर्यावरण इंजीनियरिंग का पाठ पढ़ाया और उत्कृष्ट शिक्षण के लिए कई बड़े सम्मान हासिल किए.
प्रोफेसर अग्रवाल उन गिने-चुने बुद्धिजीवियों में से थे, जिन्होंने केवल बंद कमरों या प्रयोगशालाओं में बैठकर थ्योरी नहीं दी, बल्कि जमीन पर उतरकर संघर्ष का रास्ता चुना. साल 2010 के आसपास, उन्होंने मां गंगा की पुकार सुनी और अपना सर्वस्व त्याग कर संन्यास दीक्षा ले ली, जिसके बाद उन्हें ‘स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद’ के नाम से जाना गया. उनका एकमात्र संकल्प था कि गंगा को हर हाल में प्रदूषण और शोषण से मुक्त कराकर उसे उसकी प्राकृतिक अविरल धारा वापस दिलाई जाए.
स्वामी सानंद ने सरकार के सामने बेहद तार्किक और वैज्ञानिक मांगें रखी थीं. उनकी स्पष्ट मांग थी कि गंगा पर बनने वाले बड़े बांधों और हाइड्रोप्रोजेक्ट्स पर तुरंत रोक लगे, नदी में चल रहा अवैध खनन बंद हो और औद्योगिक प्रदूषण फैलाने वालों पर सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए. अपनी इन मांगों को मनवाने के लिए उन्होंने कई बार अनशन किए, लेकिन साल 2018 में शुरू हुआ उनका आखिरी आमरण अनशन 111 दिनों तक चला. 11 अक्टूबर 2018 को हरिद्वार में इस महान वैज्ञानिक संन्यासी ने अंतिम सांस ली और उनका यह बलिदान देश में नदी संरक्षण की एक अमर मशाल बन गया.
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-भारत एक्सप्रेस
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