भारत के इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं, जिनकी पहचान किसी एक उपलब्धि तक सीमित नहीं रही. राजकुमारी अमृत कौर भी उन्हीं महान हस्तियों में शामिल हैं. एक शाही परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने आरामदायक जीवन का मोह छोड़कर देश की आजादी और उसके भविष्य को संवारने का रास्ता चुना. यही वजह है कि आज उन्हें सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूत नींव रखने वाली महिला के तौर पर भी याद किया जाता है.
2 फरवरी 1889 को कपूरथला के शाही परिवार में जन्मीं राजकुमारी अमृत कौर का बचपन सुख-सुविधाओं के बीच बीता. उन्हें अंग्रेजी शिक्षा मिली और पश्चिमी संस्कृति से भी गहरा परिचय था. लेकिन समय के साथ महात्मा गांधी के विचारों ने उनके जीवन की दिशा बदल दी. उन्होंने राजसी जीवन को पीछे छोड़ दिया और पूरी तरह स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गईं.
आजादी की लड़ाई में उनकी सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा. कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने फैसले से कभी पीछे हटने का रास्ता नहीं चुना. देश के प्रति उनकी निष्ठा और समाज के लिए काम करने की भावना ने उन्हें स्वतंत्र भारत के नेतृत्व का भरोसेमंद चेहरा बना दिया.
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तो पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पहली कैबिनेट में राजकुमारी अमृत कौर को स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंपी. यह अपने आप में ऐतिहासिक फैसला था. उन्होंने 1947 से 1957 तक लगभग दस वर्षों तक इस अहम मंत्रालय का नेतृत्व किया. उस दौर में देश कई स्वास्थ्य चुनौतियों से जूझ रहा था, लेकिन उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने की दिशा में लगातार काम किया.
अगर राजकुमारी अमृत कौर के सबसे बड़े योगदान की बात की जाए तो वह नई दिल्ली में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की स्थापना मानी जाती है. उन्होंने इस महत्वाकांक्षी संस्थान के लिए देश और विदेश दोनों जगह से आर्थिक सहयोग जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बताया जाता है कि उन्होंने शिमला स्थित अपनी पुश्तैनी संपत्ति ‘मैनोरविले’ भी इस उद्देश्य के लिए दान कर दी थी.
साल 1956 में संसद में AIIMS से जुड़ा विधेयक लाने और इस संस्थान को वास्तविक रूप देने में उनकी भूमिका बेहद निर्णायक रही. आज AIIMS देश के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में गिना जाता है और लाखों मरीजों के इलाज के साथ-साथ उच्च स्तर की मेडिकल शिक्षा का केंद्र भी है.
राजकुमारी अमृत कौर ने सिर्फ अस्पतालों और मेडिकल शिक्षा तक ही अपने काम को सीमित नहीं रखा. उन्होंने टीबी, मलेरिया और कुष्ठ रोग जैसी गंभीर बीमारियों के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर अभियान शुरू करवाए. उनका मानना था कि स्वस्थ समाज ही मजबूत राष्ट्र की नींव बन सकता है.
इसके साथ ही उन्होंने बच्चों और जरूरतमंद लोगों के कल्याण के लिए भी कई महत्वपूर्ण पहल कीं. भारतीय बाल कल्याण परिषद की स्थापना में उनका अहम योगदान रहा, वहीं भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी को मजबूत बनाने में भी उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उनके प्रयासों का असर आने वाले वर्षों में देश की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में साफ दिखाई दिया.
2 अक्टूबर 1964 को राजकुमारी अमृत कौर का निधन हो गया, लेकिन उनका काम आज भी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में जीवित है. AIIMS जैसे संस्थान और उनके समय में शुरू हुए कई स्वास्थ्य अभियान इस बात का प्रमाण हैं कि दूरदर्शी नेतृत्व किस तरह आने वाली पीढ़ियों के लिए मजबूत व्यवस्था तैयार कर सकता है.
राजकुमारी अमृत कौर का जीवन यह संदेश देता है कि किसी व्यक्ति की असली पहचान उसके परिवार या पद से नहीं, बल्कि समाज और देश के लिए किए गए कार्यों से बनती है. शाही परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने राष्ट्र सेवा को अपना सबसे बड़ा धर्म माना और अपने काम से इतिहास में ऐसी जगह बनाई, जिसे आने वाली पीढ़ियां हमेशा सम्मान के साथ याद करेंगी.
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भारत एक्सप्रेस
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