रास बिहारी बोस
भारत की आजादी की लड़ाई में कई ऐसे क्रांतिकारी हुए, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश के नाम कर दिया. इन्हीं महान सेनानियों में एक नाम रास बिहारी बोस का भी है. दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि विदेश में रहकर भी अंग्रेजों के खिलाफ ऐसी लड़ाई लड़ी, जिसने आजादी के आंदोलन को नई ताकत दी. जापान की धरती से उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई और आगे चलकर आजाद हिंद फौज की बुनियाद तैयार की.
रास बिहारी बोस का जन्म 25 मई 1886 को पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले के सुबलदह गांव में हुआ था. बचपन से ही उनके मन में अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचारों को लेकर गहरा आक्रोश था. उस दौर में देशभर में स्वतंत्रता की चिंगारी फैल रही थी और युवा पीढ़ी अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने के लिए हर संभव रास्ता तलाश रही थी. रास बिहारी बोस भी इसी सोच के साथ क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए.
साल 1912 में उन्होंने ब्रिटिश सरकार को हिला देने वाली एक बड़ी योजना बनाई. दिल्ली में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम फेंका गया. हालांकि हार्डिंग की जान बच गई, लेकिन इस घटना ने अंग्रेजी शासन को साफ संदेश दे दिया कि भारतीय क्रांतिकारी अब खुलकर चुनौती देने लगे हैं.
1915 में रास बिहारी बोस गदर आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे. इस आंदोलन का मकसद भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ बड़े पैमाने पर विद्रोह खड़ा करना था. जब अंग्रेजी पुलिस उनके पीछे पड़ गई और गिरफ्तारी का खतरा बढ़ गया, तब उन्होंने पहचान बदलकर जापान का रुख किया.
जापान पहुंचना उनके लिए सिर्फ बच निकलने का रास्ता नहीं था, बल्कि वहीं से उन्होंने आजादी की लड़ाई को नया मोड़ दिया. उन्होंने जापानी भाषा सीखी और वहां के लोगों को भारत की गुलामी की सच्चाई बतानी शुरू की. इतना ही नहीं, उन्होंने ‘न्यू एशिया’ नाम का अखबार भी निकाला, जिसके जरिए भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज विदेशों तक पहुंची.
रास बिहारी बोस ने जापान में रहते हुए वहां के समाज में खुद को ढाल लिया. उन्होंने 1916 में तोशिको सोमा से विवाह किया, जो जापान के एक प्रभावशाली परिवार से थीं. बाद में उन्होंने जापानी नागरिकता भी ले ली. लेकिन दिल से वे हमेशा भारतीय ही रहे.
उन्होंने जापानी भाषा में कई किताबें लिखीं, जिनमें ब्रिटिश शासन की क्रूरता और भारतीय राष्ट्रवाद का जिक्र था. खास बात यह रही कि उन्होंने रामायण का जापानी भाषा में अनुवाद भी किया. इससे भारत और जापान के सांस्कृतिक रिश्तों को मजबूती मिली.
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रास बिहारी बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया में रह रहे भारतीयों को एकजुट करना शुरू किया. 28 मार्च 1942 को टोक्यो में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की गई. इसके कुछ महीनों बाद इंडियन नेशनल आर्मी यानी आजाद हिंद फौज का गठन हुआ.
इस सेना में उन भारतीय सैनिकों को शामिल किया गया, जिन्हें युद्ध के दौरान अंग्रेजों की तरफ से लड़ते हुए जापान ने बंदी बनाया था. रास बिहारी बोस चाहते थे कि ये सैनिक अब भारत की आजादी के लिए लड़ें.
बाद में उन्होंने महसूस किया कि इस आंदोलन को एक ऐसे नेता की जरूरत है, जिसकी पहचान पूरे देश में हो. यही वजह थी कि उन्होंने सुभाष चंद्र बोस को नेतृत्व सौंपने का फैसला किया. 1943 में जब नेताजी जापान पहुंचे, तब रास बिहारी बोस ने पूरी जिम्मेदारी उनके हाथों में दे दी. यह फैसला उनके बड़े दिल और दूरदर्शी सोच को दिखाता है.
21 जनवरी 1945 को टोक्यो में रास बिहारी बोस का निधन हो गया. दुख की बात यह रही कि वे अपनी आंखों से भारत को आजाद होते नहीं देख पाए. लेकिन उनकी बनाई नींव पर खड़ी आजाद हिंद फौज ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी और अंग्रेजों की जड़ें हिलाकर रख दीं.
रास बिहारी बोस सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि भारत और जापान के बीच दोस्ती की मजबूत कड़ी भी थे. जापान में आज भी लोग उन्हें सम्मान से ‘सेंसेई’ यानी गुरु कहकर याद करते हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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