Shaheed Diwas Special: आज शहीद-ए-आजम भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी की 95वीं वर्षगांठ है. इस अवसर पर पंकज चतुर्वेदी की हालिया प्रकाशित पुस्तक ‘मेरे भगत सिंह’ (पेंगुइन स्वदेश द्वारा प्रकाशित) विशेष रूप से प्रासंगिक हो उठती है. ये किताब भगत सिंह को सिर्फ क्रांतिकारी नायक के रूप में नहीं, बल्कि एक पूर्ण मानवीय व्यक्तित्व के रूप में चित्रित करती है. इस आलेख में पुस्तक के कुछ चुनिंदा विशेष अंशों की चर्चा करेंगे, जो भगत सिंह के जीवन के उन अनछुए पहलुओं को उजागर करते हैं जो अन्य किताबों में कम देखने को मिलते हैं. ये अंश परिवार की स्मृतियों, क्रांतिकारी साथियों की यादों और जेल की बौद्धिक बहसों पर केंद्रित हैं.
पुस्तक का सबसे भावुक और मानवीय अंश माता-पिता तथा रिश्तेदारों की ममतामयी स्मृतियां है. यहां भगत सिंह को बचपन का मासूम बच्चा दिखाया गया है- जिसकी शरारतें, पारिवारिक मूल्य और घरेलू माहौल उनके बाद के क्रांतिकारी जीवन की नींव रखते हैं.
लेखक ने इन स्मृतियों को इतनी जीवंतता से दर्ज किया है कि पाठक महसूस करते हैं जैसे वे स्वयं लाहौर के उस घर में खड़े हैं, जहां छोटा भगत सिंह खेलता-कूदता था. ये अंश भगत सिंह को ‘मेरा’ बनाने का काम करते हैं, वे दिखाते हैं कि एक साधारण परिवार का बेटा कैसे धीरे-धीरे समाज की अन्याय के खिलाफ उठ खड़ा हुआ.
ये हिस्सा पुस्तक को केवल इतिहास नहीं, बल्कि एक भावनात्मक दस्तावेज बनाता है, जहां बचपन की मासूमियत और पारिवारिक लगाव भगत सिंह की क्रांति को और भी गहरा अर्थ देते हैं.
दूसरा महत्वपूर्ण विशेष अंश क्रांतिकारी मित्रों यानी शिव वर्मा और दुर्गा भाभी के साथ साझा सपनों और संगठन की रणनीतियों का है. पुस्तक में इन साथियों की यादों के माध्यम से भगत सिंह की वह छवि उभरती है जो सिर्फ ‘बम फेंकने वाला’ नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी रणनीतिकार और विचारक है. यहां वर्णित अंशों में असेंबली बम कांड की तैयारी, ‘इंकलाब जिंदाबाद’ नारे की पृष्ठभूमि और क्रांति की भूमि की चर्चा है.
लेखक ने इन अंशों को इतना विस्तार से रखा है कि पाठक समझ पाते हैं कि भगत सिंह की क्रांति केवल हिंसा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित समाजवादी दर्शन थी. ये हिस्से युवा पाठकों को प्रेरित करते हैं कि सच्ची क्रांति सोच, पढ़ाई और सामूहिक प्रयास से आती है.
तीसरा और सबसे बौद्धिक अंश जेल के भीतर हुई बौद्धिक बहसों का है. लाहौर जेल में भगत सिंह की नास्तिकता, समाजवादी दर्शन की ओर झुकाव और महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू आदि जैसे समकालीन नेताओं के विचारों की तुलना इन अंशों में जीवंत हो उठती है. पुस्तक में इन बहसों का विस्तृत लेखा-जोखा है, जो दर्शाता है कि फांसी से कुछ दिन पहले तक भगत सिंह कितने गहन अध्ययन और बहस में डूबे हुए थे.
ये अंश दिखाते हैं कि उनकी शहादत केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक दार्शनिक बलिदान थी. महात्मा गांधी और नेहरू के विचारों के साथ तुलना करके लेखक भगत सिंह के राजनीतिक महत्त्व को और मजबूत करते हैं कि उनकी विचारधारा आज भी प्रासंगिक है.
ये विशेष अंश पुस्तक को अन्य भगत सिंह साहित्य से अलग करते हैं. जहां चमन लाल या कुलदीप नैयर की रचनाएं मुख्यतः दस्तावेजी हैं, वहां पंकज चतुर्वेदी ने करीबियों की आंखों से देखकर एक भावनात्मक और व्यक्तिगत कथा गढ़ी है. शहादत दिवस पर इन अंशों को पढ़ना सिर्फ स्मरण नहीं, बल्कि एक नई प्रेरणा है कि भगत सिंह की तरह हम भी सोचें, संघर्ष करें और बलिदान के लिए तैयार रहें.
‘मेरे भगत सिंह’ पढ़कर कोई भी पाठक कहेगा कि भगत सिंह मर नहीं सकते, क्योंकि उनके विचार, उनकी मासूमियत और उनकी बौद्धिकता आज भी जिंदा हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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