आज बिहार का गौरव दिवस है. 1912 में 22 मार्च को बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग होकर बिहार ने स्वतंत्र राज्य का रूप लिया था. यह दिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि मगध की प्राचीन महानता, बुद्ध-महावीर की करुणा-ज्ञान की भूमि, आर्यभट्ट की गणितीय क्रांति और सबसे बढ़कर नालंदा के उस अद्भुत ज्ञान-मंदिर की याद दिलाता है, जिसने पूरी दुनिया को सदियों तक रोशन किया.
नालंदा विश्वविद्यालय: बिहार की शान
बिहार की शान नालंदा विश्वविद्यालय आज भी विश्व चेतना का उद्गम स्थल माना जाता है. पांचवीं शताब्दी में स्थापित यह महाविहार मात्र एक विश्वविद्यालय नहीं था. यह एक सभ्यता का केंद्र था.
यहां हजारों छात्र और शिक्षक एक साथ रहते थे. चीन से आए ह्वेनसांग और इत्सिंग जैसे यात्री इसके वर्णन में कहते हैं कि नालंदा में 10,000 से अधिक छात्र और 2,000 से अधिक शिक्षक थे. पुस्तकालय ‘धर्मगंज’ में लाखों ग्रंथ थे और रत्नसागर, रत्नोदधि और रत्नरंजक जैसे नामों से प्रसिद्ध तीन विशाल भवन.
यहां पढ़ाए जाते थे:
- बौद्ध दर्शन और तंत्र
- वेद, व्याकरण, न्यायशास्त्र
- गणित, खगोलशास्त्र
- चिकित्सा (आयुर्वेद)
- भाषा, काव्य, कला और वास्तुकला
पूरी दुनिया को ज्ञान के प्रकाश से रोशन किया
नालंदा ने न केवल भारत को, बल्कि कोरिया, जापान, तिब्बत, चीन, इंडोनेशिया तक ज्ञान का प्रकाश फैलाया. यहीं से कई ग्रंथ अनूदित हुए, जो आज भी महायान बौद्ध धर्म की नींव हैं.
दुर्भाग्य से 12वीं शताब्दी में बख्तियार खिलजी के आक्रमण में यह विशाल ज्ञान-भंडार जलकर राख हो गया. लेकिन बिहार की मिट्टी में ज्ञान की वह चिंगारी कभी बुझी नहीं.
आज उसी प्राचीन नालंदा की याद में नई नालंदा विश्वविद्यालय फिर से खड़ी हो रही है- एक आधुनिक, अंतरराष्ट्रीय संस्थान के रूप में. इस गौरव गाथा को हिंदी पाठकों तक पहुंचाने का सराहनीय प्रयास किया है पेंगुइन स्वदेश ने.
क्या है किताब की कहानी?
अभय के. की लिखित पुस्तक “नालंदा: विश्व चेतना का उद्गम स्थल” (हिंदी अनुवाद) पेंगुइन स्वदेश द्वारा प्रकाशित है. ये किताब नालंदा के उत्थान, पतन और पुनर्जीवन की पूरी कहानी बयान करती है.
ये पुस्तक न केवल नालंदा महाविहार की पूरी कहानी बताती है, बल्कि बिहार के उस गौरव को फिर से जीवंत कर देती है जो आज भी पूरी दुनिया को प्रेरणा देता है.
पुस्तक कई सवालों के जवाब देती है जो सदियों से पूछे जाते रहे हैं:
नालंदा कब और किसने स्थापित किया? वहां कौन पढ़ते-पढ़ाते थे? कितने छात्र-शिक्षक थे? क्या यह आधुनिक अर्थों में विश्वविद्यालय था? उसके पतन का कारण क्या था?
अभय के. विस्तृत शोध के बाद नालंदा के उत्थान, पतन और पुनर्जीवन की रोमांचक यात्रा बयां करते हैं. पुस्तक बताती है कि नालंदा केवल एक बौद्ध विहार नहीं था. वह विज्ञान, चिकित्सा, गणित, खगोलशास्त्र, दर्शन, कला, वास्तुकला, अनुवाद, काव्य, व्याकरण और धर्म जैसे क्षेत्रों का वैश्विक केंद्र था.
विदेशों से पढ़ने आए लोग
यहां के नागार्जुन, धर्मकीर्ति और शीलभद्र जैसे महान विद्वानों ने न केवल भारत बल्कि चीन, तिब्बत, जापान, कोरिया और मध्य एशिया तक ज्ञान की ज्योति फैलाई. विदेशी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग जैसे चीनी विद्वान यहीं पढ़ने आए और यहीं से लौटकर अपनी किताबें लिखीं. नालंदा ने दुनिया को यह सिखाया कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती.
लेखक अभय के. खुद नालंदा के ही रहने वाले हैं. उन्होंने कहा, “नालंदा मेरे जन्मस्थान और प्रेरणा का स्रोत है.” उन्होंने ‘द बुक ऑफ बिहारी लिटरेचर’ भी संपादित किया है. उनकी यह पुस्तक बिहार के गौरव को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बन गई है.
इतिहास नहीं प्रेरणा की किताब
बिहार दिवस पर यह पुस्तक हमें याद दिलाती है कि बिहार सिर्फ भूमि नहीं, बल्कि ज्ञान की जड़ है. जब पूरी दुनिया आधुनिक विश्वविद्यालयों की बात करती है, तब नालंदा उससे भी पुराना और उससे भी महान था. आज नालंदा का पुनर्निर्माण हो रहा है, नया नालंदा विश्वविद्यालय फिर से विश्व पटल पर अपनी पहचान बना रहा है.
पेंगुइन स्वदेश की ये किताब (208 पृष्ठ, मूल्य ₹350) हर बिहारी के लिए पढ़ने लायक है. यह सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि गर्व और प्रेरणा की किताब है.
इसमें विस्तार से बताया गया है:
- नालंदा की स्थापना और विकास कैसे हुआ?
- वहां कौन-कौन से विषय पढ़ाए जाते थे?
यह पुस्तक सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि बिहार की बौद्धिक विरासत का एक जीवंत दस्तावेज है. नालंदा सिर्फ बिहार का नहीं, बल्कि पूरे भारत और मानव सभ्यता का गौरव है.
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-भारत एक्सप्रेस
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