Chernobyl Disaster Fungus: साल था 1986 और तारीख थी 26 April, तत्कालीन सोवियत संघ के द्वारा चेरनोबिल (वर्तमान में यूक्रेन) में मौजूद परमाणु संयंत्र में खतरनाक विस्फोट हुआ. इस विस्फोट में सैकड़ों लोगों की मौत हुई और लगभग एक तिहाई यूरोप के ऊपर रेडियोएक्टिव बादल फैल गए. इस घटना के तुरंत बाद 4 वर्ग किलोमीटर में मौजूद पाइन का जंगल लाल और भूरे रंग में बदलकर नष्ट हो गए. इस इलाके के जंगल आज भी लाल और भूरे रंग के हैं. इस वजह से इन्हें रेड फॉरेस्ट कहा जाता है.
चेरनोबिल हादसे ने वहां के इंसानों और प्रकृति को पूरी तरह तबाह कर दिया. तबाही का आलम ये है कि आज भी वहां पर रेडियो विकिरण की मात्रा इतनी ज्यादा है कि उस क्षेत्र में एक घंटे से ज्यादा समय बिताने वाले लोगों को रेडिएशन का खतरा पैदा हो जाता है. लेकिन इस मौत के सन्नाटे के बीच वैज्ञानिकों को ऐसा जीव मिला है जिसने उनकी सोच बदल दी है. यह जीव कुछ और नहीं बल्कि एक काले रंग का फंगस है. जिसका नाम क्लैडोस्पोरियम स्पैरोस्पर्मम (Cladosporium sphaerospermum) है. इस फंगस की खासियत ये है कि यह रेडिएशन को अपने भोजन के जैसे इस्तेमाल करता है.
साल 1986 के चेरनोबिल हादसे के बाद आसपास का इलाका हमेशा के लिए नो एंट्री जोन बन गया, लेकिन जब दशकों बाद वैज्ञानिक रिएक्टर की दीवारों की जांच के लिए वहां पहुंचे तो पाया कि जहां पर कोई पेड़-पौधे और जीव तुरंत रेडियेशन से प्रभावित होकर खत्म हो सकते हैं. वहां एक काली काई तेजी से फैल रही है. शुरुआत में यह केवल दीवारों पर काली परत जैसा दिखाई दे रहा था, लेकिन जब इसके नमूने इकट्ठे किये गए और जांच के लिए भेजा गया. तो पता चला कि यह फंगस रेडियेशन को सिर्फ सह नहीं रहा, बल्कि उससे अपने लिए एनर्जी भी बना रहा है.
अल्बर्ट आइंस्टीन कॉलेज ऑफ़ मेडिसिन न्यूयॉर्क की एक रिसर्च के अनुसार चेरनोबिल हादसे के बाद इस इलाके में फैले क्लैडोस्पोरियम स्पैरोस्पर्मम (Cladosporium sphaerospermum) में मौजूद मेलानिन इसे रेडियेएशन से बचने के लिए जरूरी कवच प्रदान करता है. इसकी मदद से यह फंगस रेडिएशन को सोखकर उसे रासायनिक उर्जा में बदल देता है. वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया को रेडियोसिंथिसीस (Radiosynthesis) नाम दिया है. यानी जैसे पेड़ पौधे सूरज की रोशनी से फोटोसिंथिसीस (Photosynthesis) करते हैं, वैसे यह फंगस रेडिएशन से अपनी ग्रोथ बढ़ाता है.
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इस घटना के बाद वैज्ञानिकों ने इस फंगस की क्षमता को टेस्ट करने के लिए इसे अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन भेजा. जहां कॉस्मिक रेडियेशन सबसे ज्यादा होता है. वहां रिसर्च में पाया गया कि जहां कॉस्मिक रेडियेशन की मात्रा जितनी ज्यादा होती है, वहां यह फंगस और भी तेजी से बढ़ता है. इससे वैज्ञानिकों को अंदाजा हुआ कि यह केवल चेरनोबिल की दीवारों पर ही नहीं बल्कि अंतरिक्ष की कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी फल-फूल सकता है.
यह फंगस जहरीले Toxic Black Mold जैसा नहीं है. जिसकी वजह से यह इंसानों को सीधे नुकसान नहीं पहुंचाता, लेकिन एलर्जी जैसी बीमारियों से पीड़ित संवेदनशील लोगों में मामूली रिएक्शन हो सकता है. इसलिए यह मनुष्यों के लिए खतरनाक है, कहना गलत होगा.
-भारत एक्सप्रेस
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