Nimisha Priya Case: यमन, हूती विद्रोहियों का वो इलाका जहां से गुजरने से पहले अमेरिका और यूरोप भी 10 बार सोचते हैं. जिनसे भिड़ने से पहले इजरायल को नेटो के साथ मिलकर वॉर प्लान बनाना पड़ता है. आखिर उस यमन में भारत का सिक्का कैसे चलता है. आइये बताते हैं.
यमन में केरल की नर्स निमिषा प्रिया को 16 जुलाई को फांसी की सजा दी जानी थी. लेकिन फांसी की सजा के ठीक एक दिन पहले 15 जुलाई को यमन ने की अदालत ने फांसी पर रोक लगा दी. हूती विद्रोहियों के कब्जे वाले इलाके में यह एक बड़ी बात थी. जिन हूतियों से बातचीत करना अमेरिका के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है. आखिर उन्होंने भारत की बात मान ली. ये कोई चमत्कार नहीं बल्कि मोदी सरकार की डिप्लोमेसी है.
दरअसल केरल की नर्स निमिषा प्रिया हत्या के मामले में दोषी पाई गई है. जिसके बाद ये तय था कि उसे फांसी की सजा मिले, लेकिन इसी बीच भारत की सरकार एक्टिव हो गई. भारत सरकार ने ये कोशिशें तेज कर दी कि किसी तरह से पीड़ित परिवार के साथ एक म्यूचुअल एग्रीमेंट हो जाए. ताकि निमिषा को बचाया जा सके.
एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक यमन में ब्लड मनी का कानून है. यानी हत्या के बदले पैसे. अगर पीड़ित परिवार ब्लड मनी लेने पर मान जाता है तो मृत्युदंड रोका जा सकता है. जिसके बाद भारत सरकार का सारा ध्यान पीड़ित परिवार को ब्लड मनी लेने के लिए राजी करने पर हो गया.
जब आधिकारिक कोशिश काम नहीं आई तो भारत ने धार्मिक डिप्लोमेसी का सहारा लिया. इसके लिए भारत सरकार ने 94 साल के कंथापुरम एपी अबूबक्कर मुसलियार से संपर्क किया और उन्हें इस मामले में मध्यस्थता के लिए मनाया. मुसलियार को ग्रैंड मुफ्ती ऑफ इंडिया नाम से जाना जाता है.
इसके बाद मुसलियार ने वो किया जो किसी भी सरकारी मशीनरी के लिए करना मुश्किल था और वो था यमन के ताकतवर धार्मिक धर्मगुरुओं से बातचीत. मुसलियार ने यमन के सूफी इस्लामी विद्वान शेख हबीब उमर बिन हाफिज के साथ बातचीत कर इसका रास्ता निकालने के लिए कहा. जिसके बाद शेख उमर ने तुरंत पीड़ित परिवार के लोगों से मिलने के लिए अपने लोगों को भेजा.
शेख उमर के लोगों ने तालाल अब्दो महदी (जिसकी हत्या में निमिषा दोषी पाई गई हैं.) के परिजनों और कबायली नेताओं से मुलाकात की.
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जिसके बाद फांसी से एक दिन पहले उत्तरी यमन में मौजूद क्रिमिनल कोर्ट में बैठक हुई. इस बैठक में तालाल के परिजन, कबायली नेता, सरकारी अधिकारी, चीफ जज और धार्मिक गुरु शामिल हुए. जहां तालाल के परिजन ब्लड मनी लेने पर राजी होने के संकेत दिये. जिसके बाद फिलहाल के लिए निमिषा की फांसी टाल दी गई.
उत्तरी यमन वो इलाका है जहां हूती विद्रोहियों का कब्जा है. ये हूती विद्रोही प्रतिदिन रेड सी से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाते हैं. उस जगह पर अगर भारत के कहने पर एक आपातकालीन कोर्ट बैठ रही हो. तो यह कुछ और नहीं बल्कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सफल कूटनीति का ही एक नमूना है.
यह बात 2008 की है. जब केरल की रहने वाली निमिषा यमन में नर्स बनकर गई थीं. कुछ साल काम करने के बाद निमिषा यमन में अपना एक क्लिनिक खोलना चाहा. जिसके लिए किसी यमनी पार्टनर की जरूरत पड़ी. निमिषा ने इसके लिए यमनी नागरिक तालाल अब्दो महदी के साथ बात की और दोनों साझेदारी में क्लिनिक खोलने के लिए राजी हो गए. कुछ समय बाद तालाल और निमिषा के बीच खींचतान शुरू हो गई. निमिषा के परिजनों का कहना है कि, तालाल ने निमिषा का पासपोर्ट छीन लिया और उसे प्रताड़ित करने लगा. इससे बचने के लिए निमिषा ने तालाल को बेहोश करने के लिए कुछ दवाइयां दे दी, ताकि वो पासपोर्ट लेकर भाग सकें, लेकिन इससे तालाल की मौत हो गई. जिस मामले में यमन सरकार ने निमिषा को 2020 में मौत की सजा सुनाई थी.
– भारत एक्सप्रेस
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