अब इजरायल में भी हो गई वोट चोरी, नेतन्याहू के आरोप ने मचाया बवाल
Vote Chori In Isreal: इजरायल के चुनाव में वोटों की गिनती पूरी हो चुकी है, लेकिन सरकार किसकी बनेगी, यह तय नहीं हो पाया है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन 120 सदस्यीय संसद में बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गया है. दूसरी तरफ अरब नेतृत्व वाली पार्टियों की 19 सीटों ने पूरे चुनावी गणित को बदल दिया है. अब इसी बीच चुनाव में वोट चोरी और विदेशी हस्तक्षेप के आरोपों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है. नेतन्याहू की पार्टी लिकुड का आरोप है कि अरब पार्टियों को विदेशी फंडिंग के जरिए चुनाव में फायदा पहुंचाया गया. मामला इतना आगे बढ़ा कि केंद्रीय चुनाव समिति के प्रमुख न्यायमूर्ति नोआम सोलबर्ग ने देश की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट को जांच के निर्देश दे दिए.
हालांकि, अब तक बड़े पैमाने पर चुनावी धांधली के आरोप साबित नहीं हुए हैं. चुनाव अधिकारियों ने भी व्यापक गड़बड़ी के दावों को खारिज किया है. ऐसे में सवाल है कि आखिर इजरायल में वोट चोरी का यह विवाद क्या है? नेतन्याहू कतर और तुर्किये का नाम क्यों ले रहे हैं और अरब पार्टियों की 19 सीटें सरकार बनाने के लिए इतनी अहम क्यों हो गई हैं? आइए पूरे मामले को आसान भाषा में समझते हैं.
इजरायल में 27 अक्टूबर को हुए संसदीय चुनाव के बाद 29 अक्टूबर को मतगणना पूरी हो गई. नतीजों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन उनके गठबंधन को सरकार बनाने लायक सीटें नहीं मिलीं.
इजरायल की संसद को नेसेट (Knesset) कहा जाता है. इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं. सरकार बनाने के लिए किसी भी गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए. इस बार सीटों का गणित कुछ ऐसा रहा:
यानी नेतन्याहू का खेमा बहुमत से 8 सीट दूर रह गया. विपक्ष को भी अकेले बहुमत नहीं मिला. दूसरी तरफ अरब नेतृत्व वाली राअम और जॉइंट लिस्ट ने मिलकर 19 सीटें हासिल कीं. यही सीटें अब सरकार गठन की चर्चा के केंद्र में हैं. चुनाव के अंतिम आधिकारिक नतीजे 4 नवंबर को राष्ट्रपति को सौंपे जाने हैं.
चुनाव के नतीजे आने के बाद प्रधानमंत्री नेतन्याहू की पार्टी लिकुड ने अरब नेतृत्व वाली पार्टियों पर चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगाए. पार्टी का दावा है कि मतदान के दौरान रिश्वतखोरी, मतदाताओं को धमकाने, हिंसा, फर्जी दस्तावेजों और एक से ज्यादा बार वोट डालने जैसी गतिविधियां हुईं.
लिकुड ने इन आरोपों की जांच पुलिस, शिन बेट और केंद्रीय चुनाव समिति से कराने की मांग की. पार्टी ने यह भी दावा किया कि उसके पास कथित गड़बड़ियों से जुड़े सैकड़ों बयान और अन्य सामग्री है.
हालांकि चुनाव में गड़बड़ी के आरोप लगना और उनका साबित होना दो अलग-अलग बातें हैं. अभी तक बड़े पैमाने पर वोट चोरी या सुनियोजित चुनावी धांधली का कोई प्रमाणित मामला सामने नहीं आया है. केंद्रीय चुनाव समिति के कार्यवाहक महानिदेशक डीन लिवने ने भी व्यापक चुनावी धांधली के आरोपों को निराधार बताया है.
नेतन्याहू और उनकी पार्टी ने कथित चुनावी गड़बड़ियों को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है. उन्होंने इसे ‘राअमगेट’ नाम दिया और आरोप लगाया कि विदेशी ताकतों ने अरब नेतृत्व वाली पार्टियों राअम और जॉइंट लिस्ट को चुनाव में फायदा पहुंचाने की कोशिश की.
नेतन्याहू का दावा है कि इस कथित हस्तक्षेप का मकसद इजरायल में दक्षिणपंथी सरकार को कमजोर करना और देश की सुरक्षा नीतियों को प्रभावित करना था.
उनकी पार्टी का आरोप है कि अरब मतदाताओं को मतदान के लिए जुटाने के नाम पर गलत तरीके से पैसे का इस्तेमाल किया गया. हालांकि विपक्षी नेताओं ने आगाह किया है कि जांच को चुनावी नतीजों को प्रभावित करने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए.
इस विवाद में कतर और तुर्किये का नाम भी सामने आया है. हिब्रू भाषा के मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, लिकुड को संदेह है कि इन दोनों देशों से जुड़े स्रोतों के जरिए उन संगठनों तक पैसा पहुंचाया गया, जिन्होंने अरब मतदाताओं को मतदान केंद्रों तक लाने के लिए अभियान चलाया.
लेकिन इस मामले में एक अहम तथ्य है. केंद्रीय चुनाव समिति के प्रमुख न्यायमूर्ति नोआम सोलबर्ग ने शिन बेट को लिखे अपने पत्र में न तो कतर का नाम लिया और न ही तुर्किये का. उन्होंने केवल विदेशी संस्थाओं की ओर से चुनाव को प्रभावित करने की आशंकाओं की जांच करने को कहा.
सोलबर्ग ने साफ किया कि वह खुद इन संदेहों की वास्तविकता की पुष्टि नहीं कर सकते. हालांकि, विदेशी हस्तक्षेप की आशंका गंभीर होने के कारण उन्होंने इसकी गहराई से जांच जरूरी बताई.
यानी कतर और तुर्किये को लेकर जो बातें सामने आई हैं, वे मीडिया रिपोर्टों में बताए गए संदेह हैं. इन्हें किसी देश की भूमिका साबित करने वाला आधिकारिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता.
इजरायल की आंतरिक सुरक्षा एजेंसी शिन बेट को देश के भीतर सुरक्षा खतरों और विदेशी हस्तक्षेप से जुड़े मामलों की जांच का अधिकार है. केंद्रीय चुनाव समिति के प्रमुख नोआम सोलबर्ग ने एजेंसी के प्रमुख डेविड जिनी को पत्र लिखकर कथित विदेशी हस्तक्षेप की जांच करने को कहा.
उन्होंने जांच में यह पता लगाने को कहा कि विदेशी संस्थाओं की तरफ से चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश हुई थी या नहीं. सोलबर्ग ने शिन बेट से एक सप्ताह के भीतर जांच के निष्कर्ष पेश करने को भी कहा था.
शिन बेट ने बाद में स्पष्ट किया कि जांच के पीछे की खुफिया जानकारी एजेंसी ने अपने स्तर पर जुटाई थी. यह जानकारी किसी राजनीतिक दल या नेता की तरफ से नहीं दी गई थी. एजेंसी ने यह भी कहा कि जांच सीमित दायरे में है और इसका मतलब किसी पूरे समुदाय पर संदेह करना नहीं है.
इसका मतलब है कि जांच का मकसद कथित विदेशी हस्तक्षेप की वास्तविकता का पता लगाना है, न कि अरब मतदाताओं की पूरी आबादी को संदेह के घेरे में रखना.
चुनाव के दिन दक्षिणी इजरायल में मतदाताओं को रिश्वत देने के संदेह में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था. इसके बाद जांच के सिलसिले में चार अन्य लोगों को भी पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया.
इजरायल पुलिस ने चुनाव की निष्पक्षता से जुड़ी शिकायतों की जांच करने का भरोसा दिया है. लिकुड ने कथित तौर पर नकदी बांटने, दोबारा मतदान और मतदाताओं की संख्या तथा बैलेट लिफाफों में अंतर जैसी शिकायतें भी उठाई हैं.
लेकिन इन गिरफ्तारियों को पूरे चुनाव में बड़े पैमाने पर वोट खरीदने या धांधली का सबूत नहीं माना जा सकता. किसी व्यक्ति के खिलाफ रिश्वतखोरी का मामला सामने आना और पूरे चुनाव को प्रभावित करने वाली सुनियोजित साजिश साबित होना अलग-अलग बातें हैं.
चुनाव अधिकारियों ने भी कहा है कि अभी तक ऐसे किसी व्यापक मामले का आधार सामने नहीं आया है, जिससे चुनाव के नतीजों को प्रभावित माना जा सके.
नेतन्याहू की पार्टी के आरोपों को अरब नेतृत्व वाली पार्टियों ने सिरे से खारिज किया है. उनका कहना है कि लिकुड चुनाव में अरब मतदाताओं की बढ़ी हुई भागीदारी को बदनाम करने की कोशिश कर रही है.
जॉइंट लिस्ट के नेता अहमद तिबी ने भी चुनावी धांधली के आरोपों को खारिज किया है. अरब नेताओं का कहना है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेने वाले फलस्तीनी नागरिकों को राजनीतिक रूप से निशाना बनाया जा रहा है.
उनके मुताबिक, चुनाव में ज्यादा संख्या में अरब मतदाताओं का हिस्सा लेना लोकतांत्रिक अधिकार है. इसे विदेशी हस्तक्षेप या चुनावी गड़बड़ी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए.
दूसरी तरफ शिन बेट ने भी स्पष्ट किया है कि उसकी जांच किसी पूरे समुदाय के खिलाफ नहीं है. कानून तोड़ने वाले व्यक्ति की पहचान होने पर उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.
अब इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू समझिए. इजरायल की संसद में सरकार बनाने के लिए 61 सीटें चाहिए. नेतन्याहू का गठबंधन 53 पर अटका है और विपक्षी खेमे के पास 48 सीटें हैं.
अरब नेतृत्व वाली राअम और जॉइंट लिस्ट के पास कुल 19 सीटें हैं. अगर विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले खेमे को इन पार्टियों का समर्थन मिल जाता है, तो वह बहुमत के आंकड़े तक पहुंच सकता है.
यही वजह है कि चुनाव के बाद अरब पार्टियों की भूमिका अचानक इतनी महत्वपूर्ण हो गई है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इन पार्टियों को सरकार में मंत्री पद या गठबंधन में शामिल होना ही पड़ेगा. वे बाहर से समर्थन देकर भी सरकार गठन में भूमिका निभा सकती हैं.
लेकिन इस रास्ते में राजनीतिक अड़चनें भी कम नहीं हैं. इजरायल के कई जायोनी दल अरब पार्टियों के साथ किसी भी तरह के गठबंधन या सहयोग का विरोध कर रहे हैं. ऐसे में 19 सीटें होने के बावजूद सरकार गठन का रास्ता आसान नहीं है.
नेतन्याहू ने जायोनी पार्टियों से अपील की है कि वे राअम और जॉइंट लिस्ट के साथ किसी भी तरह का राजनीतिक समझौता न करें. उनका तर्क है कि अरब पार्टियों के समर्थन से बनने वाली सरकार देश की सुरक्षा और भविष्य की नीतियों के लिए ठीक नहीं होगी.
वहीं, विपक्षी खेमे का आरोप है कि नेतन्याहू इन मुद्दों को उठाकर वैकल्पिक सरकार बनने की संभावना को कमजोर करना चाहते हैं.
इजरायल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन ग्विर ने तो यहां तक कहा है कि अगर कानूनी आधार मौजूद है तो अरब पार्टियों के नेताओं को गिरफ्तार किया जाना चाहिए.
दूसरी तरफ विपक्षी नेता गादी आइजेनकोट ने चुनावी गड़बड़ियों की जांच का समर्थन किया है. हालांकि, उनका कहना है कि इस जांच का इस्तेमाल नई संसद के शपथ ग्रहण या लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए नहीं होना चाहिए.
इजरायल के चुनाव की मतगणना पूरी हो चुकी है और सीटों का बंटवारा भी सामने आ गया है. अब सबकी नजर सरकार गठन की प्रक्रिया पर है.
केंद्रीय चुनाव समिति को 4 नवंबर को अंतिम आधिकारिक नतीजे राष्ट्रपति इसाक हर्जोग को सौंपने हैं. इसके बाद राष्ट्रपति अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से मुलाकात करेंगे. वह ऐसे उम्मीदवार को सरकार बनाने का मौका देंगे, जिसके पास संसद में बहुमत जुटाने की व्यावहारिक संभावना होगी.
आगे की प्रक्रिया में तीन बातें सबसे अहम रहेंगी:
अगर कोई भी राजनीतिक खेमा 61 सांसदों का समर्थन जुटाने में नाकाम रहता है, तो इजरायल में दोबारा चुनाव कराने की स्थिति पैदा हो सकती है.
ये भी पढ़ें- इजराइल में सत्ता की लड़ाई: नेतन्याहू या आइजनकोट, किसके हाथ आएगी प्रधानमंत्री की कुर्सी?
फिलहाल इस पूरे विवाद में दो सवाल सबसे अहम हैं. पहला- क्या जांच में विदेशी हस्तक्षेप या चुनावी गड़बड़ी के ठोस सबूत मिलते हैं? दूसरा- क्या अरब पार्टियों की 19 सीटों के समर्थन से इजरायल में नई सरकार बन पाएगी? इन दोनों सवालों के जवाब ही आने वाले दिनों में देश की राजनीति की दिशा तय करेंगे.
-भारत एक्सप्रेस
Gold Silver Price Today: धनतेरस और शादी के सीजन से पहले सोने की कीमतों में…
Bihar Politics: बिहार की राजनीति और जेडीयू के भीतर अंतर्कलह तेज हो गई है. अनंत…
UP Jobs Latest Update: उत्तर प्रदेश सरकार ने नई भर्ती नीति के तहत बड़ा फैसला…
Aaj Ka Mausam: दिल्ली-NCR में मौसम ने अचानक ऐसी करवट ली है कि लोगों को…
PM Kisan 24th Installment Updates: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज गुजरात से पीएम किसान सम्मान निधि…
Aaj Ka Panchang: हिंदू पंचांग के अनुसार, आज 30 अक्टूबर 2026, शुक्रवार को कार्तिक मास…