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एक अभेद्य कुदरती किला, जहां घुसने का मतलब है मौत! आखिर क्यों ईरान में सैनिक भेजने से डर रहा अमेरिका? पढ़ें- EXPLAINER

Iran US Conflict: ईरान-अमेरिका संघर्ष का आज 7वां दिन है. इजरायल और अमेरिका ने जब से तेहरान को निशाना बनाया है तब से डोनाल्ड ट्रंप सत्ता परिवर्तन की राग अलाप रहे हैं. उन्होंने ईरान को धमकी भरे लहजे में चेतावनी दी है कि ईरान का नया नेता वहीं होगा जिसे अमेरिका पसंद करता है. हालांकि ईरान में सत्ता परिवर्तन के ट्रंप के ख्वाब का अमेरिका के ही पूर्व पेंटागन अधिकारी ने हवा निकाल दी. पूर्व पेंटागन अधिकारी और मिडिल ईस्ट एनालिस्ट आलिया अवादल्लाह ने कहा है कि एयर स्ट्राइक से ईरान में रेजीम चेंज करना असंभव है. इसके लिए कम से कम 22 लाख सैनिकों को ईरान की धरती पर उतारना होगा.

ट्रंप भले ही ईरान में सत्ता परिवर्तन की बातें कर रहे हैं लेकिन उन्हें पता है कि केवल हवाई हमलों से ऐसा कुछ नहीं होने वाला. जब अमेरिकी सरकार से ईरान में जब जमीन पर सैनिक उतारक हमले को लेकर सवाल पूछे जाते हैं तो ट्रंप के हाथ-पांव फूल जाते हैं. आखिर अमेरिका ईरान पर क्यों नहीं सेना उतारना चाहता.

ईरान में अमेरिका के बीच तनाव का एआई चित्र

इसका जवाब ईरान का भूगोल और रेवोल्यूशनरी गार्ड की बेहतरीन लड़ाकू क्षमता है. इसके अलावा एक और चीज है जो अमेरिका को डराती है वो है इतिहास. जब-जब अमेरिका ने दूसरे देशों की जमीन पर सेना उतारी है, उसे वहां से सिर्फ खून और राख ही मिले हैं. हालांकि पहले बात ईरान की करते हैं.

ईरान का भूगोल

पूर्व अमेरिकी मरीन लुकास गेज ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर ईरान के भूगोल से संबंधित एक तस्वीर शेयर करते हुए ट्रंप को चेतावनी देते हैं. वो कहते हैं कि अगर आप ईरान की जमीन पर सेना उतारते हैं, तो उन्हें जिंदा वापस लाना नामुमकिन होगा. वो दावा करते हैं कि यह देश एक प्राकृतिक किला है, जहां घुसने का हर रास्ता मौत की घाटी की तरफ लेकर जाता है.

ईरान का कुल क्षेत्रफल 16.5 लाख वर्ग किलोमीटर है. यह क्षेत्रफल पूरे भारत के क्षेत्रफल का आधा है. इतने बड़े क्षेत्रफल पर अमेरिकी सेना को कब्जा करने के लिए कम से कम 22 लाख सैनिकों को उतारना पड़ेगा. जो कि वियतनाम युद्ध में शामिल सैनिकों की संख्या से कई गुना ज्यादा है.

ईरान के बड़े हिस्से में पहाड़, रेगिस्तान और गहरी घाटियां हैं. ऐसे दुर्गम क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए अमेरिका को ना सिर्फ असीमित संसाधन चाहिये बल्कि इसके लिए बहुत समय चाहिये.

ईरान के पश्चिम और दक्षिण पश्चिम में जागरोस पर्वत है. इस पर्वत श्रृंखला की गिनती दुनिया के सबसे खतरनाक और कठिन इलाकों में होती है. यह श्रृंखला इराक और ईरान के बीच एक प्राकृतिक दीवार का काम करती है. अगर अमेरिकी सेना यहां से घुसने की कोशिश करती है तो वो एम्बुश का शिकार हो सकती है. वहीं उत्तर की अल्बोर्ज पहाड़ियां तेहरान की प्राकृतिक रूप से रक्षा करती हैं. ऐसे में ईरान पर सैन्य कार्रवाई करना ट्रंप की सबसे बड़ी गलती होगी.

ईरान का भूगोल

इतिहास से डरता है अमेरिका

अमेरिका ने अपनी सेना जब-जब दूसरे देशों में भेजा है, उसे तब-तब भारी नुकसान उठाना पड़ा है. खास तौर से कोरिया और वियतनाम युद्ध, जब अमेरिका के हजारों सैनिकों का नुकसान उठाना पड़ा था.

कोरियाई युद्ध (1950-1953)

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया दो भागों में बंट गई थी. एक धड़ा पूंजीवादी था जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा था. दूसरा धड़ा था साम्यवादी, जिसे सोवियत संघ (USSR)कर रहा था. दोनों देश खुद तो कभी सीधे एक-दूसरे से नहीं टकराये, लेकिन उन्होंने दूसरे देशों को अपनी प्रॉक्सी में उलझा दिया. जिसका पहला शिकार कोरिया हुआ. कोरियाई द्वीप पर दो गुट आपस में उलझे हुए थे. एक पूंजीवाद का समर्थक था और दूसरा साम्यवाद का. जिन्हें बैकडोर से अमेरिका और सोवियत संघ मदद कर रहे थे. कोरियाई द्वीप के उत्तरी क्षेत्र को उत्तर कोरिया कहा जाता है, वहीं नीचे दक्षिण की तरफ मौजूद द्वीप दक्षिणी कोरिया कहा जाता है.

जून 1950 में जब उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर आक्रमण कर दिया, तो अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र के तहत दक्षिण कोरिया में अपने ट्रूप्स भेज दिये. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका ने दक्षिण कोरिया में 3 लाख सैनिक भेजे थे.

ट्रूमैन डॉक्ट्रिन के मुताबिक अमेरिका के द्वारा दक्षिण कोरिया में अपने सैनिकों को भेजने का मुख्य उद्वेश्य कम्युनिस्ट विस्तार को रोकना था.

इस जंग में अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ा. इसमें कुल 36,574 अमेरिकी सैनिक मारे गए. वहीं हजारों सैनिक घायल हुए. इस युद्ध में उत्तर कोरिया को पीछे से सोवियत संघ और चीन मदद कर रहे थे. जिसकी वजह से युद्ध काफी लंबा खिंचा.

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वियतनाम युद्ध ने अमेरिका को दिया ना भूलने वाला दर्द

साल 1950 के दशक में अमेरिका ने ईस्ट एशिया में अपने कई सलाहकार भेजे थे. जिनका मुख्य उद्वेश्य इन देशों में पूंजीवादी व्यवस्था को मजबूत करना था. साल 1965 तक इस क्षेत्र (मुख्य रूप से वियतनाम, लाओस और कंबोडिया) में अमेरिका ने 5.43 लाख सैनिक भेजे.

वियतनाम उस समय दो भागों उत्तर वियतनाम (कम्युनिस्ट शासन) और दक्षिण वियतनाम (पूंजीवादी शासन) में बंट गया था.

डोमिनो थ्योरी के मुताबिक अमेरिका को डर था कि अगर एक देश कम्युनिस्ट व्यवस्था वाला हो गया तो पूरा दक्षिण-पूर्व एशिया (थाइलैंड और इंडोनेशिया) गिर जाएगा. इसलिए अमेरिका ने उत्तर वियतनाम से बचाने के लिए दक्षिण वियतनाम में हस्तक्षेप किया.

साल 1964 में टोंकिन खाड़ी में अमेरिकी जहाजों पर हमला हो जाता है. अमेरिका ने हमले का आरोप उत्तर वियतनाम पर लगाता है. जिसके बाद अमेरिका ने Gulf of Tonkin Resolution पास किया. जिससे अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन को बिना युद्ध घोषणा के पूरी ताकत का उपयोग करने की शक्ति मिल जाती है.

जिसके बाद साल 1965 में अमेरिका ने बड़े पैमाने पर दक्षिण वियतनाम में सेना उतार देता है. पीक पर अमेरिकी सैनिकों की संख्या 5 लाख 43 हजार तक पहुंच जाती है और उत्तर वियतनाम और दक्षिण वियतनाम में घमासान युद्ध शुरू हो जाता है.

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58 हजार से ज्यादा सैनिक मारे गए

इस युद्ध में अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ा. रिपोर्ट्स के मुताबिक वियतनाम युद्ध में अमेरिका के 58,220 सैनिक मारे गए वहीं 3 लाख से ज्यादा सैनिक मारे गए. वहीं 1600 सैनिक ऐसे भी थे जिनका कोई पता नहीं चल पाया. इस युद्ध में दक्षिण वियतनाम के करीब 2 लाख से 2.5 लाख सैनिक मारे गए. वहीं 10 लाख से ज्यादा घायल हुए.

वियतनाम युद्ध में भयानक हार देखते हुए अमेरिका 1973 में अपने सैनिकों को वापस बुला लेता है. 1975 में उत्तर वियतनाम अंतिम बार 30 अप्रैल को दक्षिण वियतनाम पर हमला करता है और पूरे इलाके पर कब्जा कर लेता है. इसके बाद वियतनाम इकट्ठा होकर आज के वियतनाम देश का निर्माण करता है.

इन युद्धों में अमेरिका ने भारी संसाधन खर्च किये, लेकिन रणनीतिक सफलता नहीं मिल पाई. अमेरिका एक बार फिर ईरान में वहीं गलती दोहराना नहीं चाहता. वैसे भी ईरान का भौगोलिक क्षेत्रफल वियतनाम से बहुत बड़ा और दुर्गम है. अमेरिका और ईरान संघर्ष का क्या हल निकलता है, ये तो वक्त बतायेगा.

-भारत एक्सप्रेस

Govind Kumar Singh

मैं गोविंद सिंह हूं और मूल रूप से बिहार के कैमूर की पहाड़ियों वाले इलाके से आता हूं। मेरी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई वाराणसी के उदय प्रताप कॉलेज से हुई। इसके बाद मैंने पटना कॉलेज, पटना से मास कम्यूनिकेशन में ग्रेजुएशन किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने करियर की शुरुआत की और अलग-अलग संस्थानों में काम करते हुए खबरों की दुनिया को करीब से समझा। अपने पेशेवर सफर में मुझे ईटीवी भारत, इनशॉर्ट्स और श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन जैसे संस्थानों के साथ काम करने का अवसर मिला। इन जगहों पर काम करते हुए मैंने रिपोर्टिंग, कंटेंट लेखन, रिसर्च और समाचारों की प्रस्तुति से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें सीखीं। फिलहाल मैं भारत एक्सप्रेस में सब एडिटर के तौर पर कार्यरत हूं। यहां मेरी मुख्य रुचि विदेश, राजनीति और बिहार से जुड़ी खबरों को कवर करने में है।

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